काठमांडू नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के मंसूबों को करारा झटका देते हुए संसद की भंग की गई प्रतिनिधि सभा को बहाल करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने संसद के निचले सदन को भंग करने के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीएम केपी शर्मा ओली के सपने को बड़ा झटका लगता नजर आ रहा है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे राजनीतिक संकट का अंत नहीं होगा। नेपाली अखबार काठमांडू पोस्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने ओली सरकार को अगले 13 दिनों के अंदर सदन का सत्र बुलाने का आदेश दिया है। ऐसे में सबसे पहले नई सरकार का गठन करना होगा क्योंकि 275 सदस्यीय निचले सदन में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के 173 सांसद हैं और वह फाड़ हो गई है। कम्युनिस्ट पार्टी के एक गुट का नेतृत्व ओली कर रहे हैं, वहीं दूसरे गुट का नेतृत्व ओली के धुर विरोधी पुष्प कमल दहल प्रचंड कर रहे हैं। 'ओली को नैतिक आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए' राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल में अब नई सरकार का गठन कैसे होगा, इसका पूरा दारोमदार पीएम ओली के उठाए जाने वाले कदमों पर टिका हुआ है। उन्होंने कहा कि ओली को नैतिक आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए और नई सरकार के गठन का रास्ता साफ करना चाहिए। त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रफेसर कृष्णा पोखरेल ने कहा, 'ओली को नैतिक आधार पर इस्तीफा देकर राजनीतिक संस्कृति का परिचय देना चाहिए। हालांकि ओली इस तरह के नेता हैं जो आसानी से हार नहीं मानेंगे।' पीएम ओली अगर इस्तीफा नहीं देते हैं तो उन्हें संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना होगा। उधर, ओली के समर्थकों ने कहा है कि प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देंगे। ओली के मीडिया सलाहकार सूर्य थापा ने कहा है कि प्रधानमंत्री संसद का सामना करेंगे। इससे पहले 20 दिसंबर को संसद को भंग किए जाने के दिन प्रचंड और माधव कुमार नेपाल ने सांसदों से अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कराया था। कृष्णा पोखरेल ने कहा कि इसी प्रस्ताव को या तो संसद में बढ़ाया जा सकता है या कोई और दल अविश्वास प्रस्ताव को ला सकता है। नेपाल में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 138 नेपाल में अविश्वास प्रस्ताव को पारित कराने और बाद में एक सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 138 है। इन सबमें नेपाली कांग्रेस किंगमेकर साबित हो सकती है जिसके 63 सांसद हैं। नेपाली कांग्रेस या तो ओली के पास जा सकती है जिनके पास करीब 80 सांसद हैं या प्रचंड के खेमे को सपोर्ट दे सकती है। हालांकि पोखरेल का मानना है कि नेपाली कांग्रेस शायद ही ओली सरकार को बचाने के लिए मदद करे। पोखरेल ने कहा, 'नेपाली कांग्रेस के लिए एक असंवैधानिक कदम उठाने वाली सरकार का समर्थन करना आसान नहीं होगा।' संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि नई सरकार का नेतृत्व कौन करेगा यह सबसे बड़ा सवाल है क्योंकि ओली के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की जरूरत नहीं है। काठमांडू यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के पूर्व डीन बिपिन अधिकारी ने कहा, 'संसद के भंग होने के दिन ही ओली एक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बन गए थे और एक कार्यवाहक प्रधानमंत्री के लिए इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है। राष्ट्रपति संसद की कार्यवाही शुरू होने के बाद नई सरकार बनाने पर फैसला ले सकती हैं।' विश्लेषकों का कहना है कि प्रचंड और नेपाल का खेमा पहले ही नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा को प्रधानमंत्री पद का ऑफर दे रहा है। नेपाल में देउबा के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो सकता है। राष्ट्रपति विद्या देवी ने 20 दिसंबर को प्रतिनिधि सभा को भंग किया बता दें कि नेपाल उस समय सियासी संकट में घिर गया था जब सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर चल रही वर्चस्व की लड़ाई के बीच प्रधानमंत्री ओली की अनुशंसा पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने 20 दिसंबर को संसद की प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया। साथ ही 30 अप्रैल और 10 मई को नए सिरे से चुनाव कराने की घोषणा कर दी। सदन भंग किये जाने की अनुशंसा करते हुए राष्ट्रपति भंडारी को लिखे अपने पत्र में ओली ने दलील दी थी कि वह सदन में 64 प्रतिशत बहुमत रखते हैं और नई सरकार के गठन की कोई संभावना नहीं है स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये देश को लोगों के नए जनादेश की आवश्यकता है। ओली के प्रतिनिधि सभा को भंग करने के फैसले का पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाले नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधी धड़े ने विरोध किया था। प्रचंड सत्ताधारी दल के सह-अध्यक्ष भी हैं। शीर्ष अदालत में संसद के निचले सदन की बहाली के लिये सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक देव प्रसाद गुरुंग की याचिका समेत 13 रिट याचिकाएं दायर की गई थीं। संविधान पीठ में विशंभर प्रसाद श्रेष्ठ, अनिल कुमार सिन्हा, सपना माल्ला और तेज बहादुर केसी भी शामिल थे। पीठ ने 17 जनवरी से 19 फरवरी तक मामले की सुनवाई की। प्रतिनिधि सभा को भंग करने के अपने फैसले का ओली (69) यह कहते हुए बचाव करते रहे हैं कि उनकी पार्टी के कुछ नेता 'समानांतर सरकार' बनाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने यह फैसला लिया क्योंकि बहुमत की सरकार का नेता होने के नाते उनके पास यह निहित शक्ति थी।
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