Thursday, 13 May 2021

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वॉशिंगटन अमेरिका में यूं तो कोरोना के मामले गिरावट की ओर हैं, मगर विशेषज्ञ अब नए खतरे को लेकर चिंता में हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल की शुरुआत में अमेरिकी बच्चों में कोरोना के संक्रमण के मामले वयस्कों की तुलना में ज्यादा देखे गए। इससे आशंका पैदा हो गई है कि क्या कोरोना अब बच्चों के लिए गंभीर संकट बनने जा रहा है। भारत में भी कई विशेषज्ञ बच्‍चों को होने वाले खतरों को लेकर चेतावनी दे चुके हैं। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन के मुताबिक, अप्रैल की शुरुआत में छोटे बच्चों से लेकर 12 साल तक की उम्र के बच्चों में कोरोना के मामले 65 या उससे ऊपर के वयस्कों की तुलना में बढ़ गए। ताजा आंकड़े भी इस ट्रेंड के बरकरार रहने की ओर इशारा करते हैं। यही नहीं, कोरोना के कारण बच्चों के अस्पताल में भर्ती होने की दर में भी कमी नहीं आई है। ऐसे में रिसर्चर्स को आशंका है कि कोरोना के वेरियंट युवाओं को नए-नए तरीके से प्रभावित कर रहे हैं। बच्चों में मल्टी सिस्टम इन्फ्लेमेट्री सिंड्रोम के दो हजार मामले इसमें सूजन पैदा करने वाली बीमारी भी शामिल है जो कोरोना से ही जोड़कर देखी जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, बॉस्टन चिल्ड्रंस हॉस्पिटल की क्रिटिकल केयर डॉक्टर एड्रीन रैंडॉल्फ कहती हैं, सबसे बड़ी समस्या यह है कि बच्चों की एक पूरी आबादी अभी बिना किसी सुरक्षाकवच के है। अकेले फरवरी में बच्चों में मल्टी सिस्टम इन्फ्लेमेट्री सिंड्रोम के दो हजार से ज्यादा मामले देखे गए, जो अप्रैल में बढ़कर तीन हजार के भी पार चले गए। बच्चों में यह बीमारी अमूमन कोरोना से ठीक होने के एक महीने बाद देखी जा रही है। यह घातक हो सकती है मगर अभी दुर्लभ है। यह शरीर के कई हिस्सों में सूजन पैदा कर देती है। फिर चाहे दिल, दिमाग, फेफड़े या आंतें ही क्यों न हों। इसमें पेटदर्द से लेकर पेचिस जैसे लक्षण उभर सकते हैं। ये आमतौर पर एक से 14 साल के बच्चों में देखी गई है। क्या ब्रिटिश वेरियंट से है ज्यादा खतरा? चूंकि अमेरिका में अभी ज्यादातर कोरोना के मामले ब्रिटिश वेरियंट b.1.1.7 के ही हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बच्चों में हो रही सूजन की बीमारी इसी वेरियंट की वजह से है। रैंडॉल्फ के मुताबिक, शरीर के अंगों में सूजन की यह बीमारी ऐसे बच्चों में ज्यादा देखी जा रही है जो दिखने में स्वस्थ हैं और जिनमें कोरोना के लक्षण भी नहीं उभरे हैं। वैक्सीन निर्माता भी अभी तक जो क्लिनिकल ट्रायल कर रहे हैं, वे वयस्कों पर ही केंद्रित हैं। 65 साल से ऊपर की 72 फीसदी आबादी का पूरी तरह टीकाकरण हो चुका है। फाइजर की वैक्सीन भी 12 से 15 की उम्र के किशोरों पर ही इस्तेमाल हो सकती है।


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