Wednesday, 27 October 2021

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पेइचिंग चीन की राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा ने हाल ही में भूमि सीमा कानून पारित किया है, जो 1 जनवरी 2022 को लागू होगा। चीन की थल सीमा भारत, नेपाल, पाकिस्तान व रूस समेत 14 देशों से लगी हुई है, जो विश्व में सर्वाधिक है। अभी पारित भूमि सीमा कानून प्रभुसत्ता की सुरक्षा और सीमा संबंधी मामलों के प्रबंधन में चीन का एक नया और अहम कदम माना जा रहा है, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की व्यापक नजर खींची है। आखिर इस नए कानून के क्या-क्या मुख्य विषय हैं? इसका पता लगाने के लिए तीन पहलुओं से देखा जा सकता है। सबसे पहले इस कानून में सीमा से जुड़े मुद्दों पर चीन के बुनियादी सिद्धांतों का स्पष्टीकरण और निश्चय किया गया है। उदाहरण के लिए इस कानून में कहा गया कि चीन प्रभावी कदम उठाकर प्रभुसत्ता और थलीय सीमा की डटकर सुरक्षा करता है और प्रभुसत्ता व थल सीमा को नुकसान करने वाली किसी भी कार्रवाई पर प्रहार करता है। उल्लेखनीय बात है कि इस कानून के पहले अनुच्छेद की 15वीं धारा में कहा गया कि चीन समानता, पारस्परिक विश्वास एवं मैत्रीपूर्ण सलाह मशवरे के सिद्धांतों पर वार्ता के जरिये थलीय पड़ोसी देश के साथ सीमा व संबंधित मामलों का निपटारा करता है और मतभेद व इतिहास से छोड़े गए सीमा सवाल का समुचित समाधान करता है। नदी के पानी को रोक सकता है चीनदूसरा, इस कानून में केंद्रीय एकीकृत नेतृत्व के तहत सीमा मामले से जुड़े चीन के विभिन्न विभागों की ठोस जिम्मेदारियां रेखांकित की गई हैं। मसलन चीनी विदेश मंत्रालय थलीय सीमा संबंधी वैदेशिक मामले पर जिम्मेदार है और थलीय सीमा प्रबंधन में भाग लेता है। केंद्रीय सैन्य आयोग के नेतृत्व में संबंधित सैन्य संस्थाएं सीमांत क्षेत्र की सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता बनाए रखने, आपात घटना के निपटारे और सीमा सुरक्षा सहयोग करने का निर्देशन व समन्वय करती हैं। राज्य परिषद के संबंधित विभागों और सीमा से लगे प्रांतों व प्रदेशों की विभिन्न स्तरीय सरकारों को कदम उठाकर सीमा पर स्थित नदी (झील) के बहाव की दिशा स्थिर करना और संबंधित संधि के मुताबिक नदी के पानी का संरक्षण और उचित प्रयोग करना चाहिए। कैसे सुलझेंगे चीन के सीमा मामले? तीसरा, इस कानून में सीमा से जुड़े मामले और संभावित घटना को सुलझाने के उपायों और प्रक्रिया का स्पष्टीकरण किया गया है। जैसे थलीय सीमा रेखांकित करने वाली संधि को मंजूरी के लिए राज्य परिषद की ओर से राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थाई समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, फिर राष्ट्रपति राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा की स्थाई समिति के फैसले के अनुसार इसकी पुष्टि करते हैं। स्थानीय विशेषज्ञों के विचार में इस भूमि सीमा कानून से चीन के सीमा मामलों के प्रबंधन को मजबूती मिलेगी और सीमा मामले का प्रबंधन कानून के मुताबिक चलेगा। इसके साथ संबंधित मामलों का निपटारा अधिक पारदर्शी और अनुमानित होगा। भारत ने बताया 'एकतरफा' कदमचीन के लैंड बाउंड्री लॉ यानी भूमि सीमा कानून पर भारत ने चीन पर ‘एकतरफा’ ढंग से नया भूमि सीमा कानून लाने के लिए निशाना साधा है। सरकार ने बुधवार को कहा कि यह चिंता का विषय है क्योंकि इस विधान का सीमा प्रबंधन पर वर्तमान द्विपक्षीय समझौतों और सीमा से जुड़े सम्पूर्ण प्रश्नों पर प्रभाव पड़ सकता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि भारत उम्मीद करता है कि चीन कानून के परिप्रेक्ष में ऐसा कोई कदम उठाने से बचेगा जिससे भारत चीन सीमा क्षेत्रों में स्थिति में एकतरफा ढंग से बदलाव आ सकता हो। सीमा विवाद पर पड़ सकता है असरउन्होंने कहा कि ऐसे ‘एकतरफा कदम’ का दोनों पक्षों के बीच पूर्व में हुई व्यवस्थाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए चाहे सीमा का सवाल हो या वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अमन और शांति बनाए रखने का विषय हो। इसका असर भारत के साथ चीन के सीमा विवाद पर पड़ सकता है। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की खबर के मुताबिक, नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (NPC) की स्थायी समिति के सदस्यों ने शनिवार को संसद की समापन बैठक के दौरान इस कानून को मंजूरी दी। इस पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बागची ने कहा, ‘चीन का एकतरफा ढंग से कानून लाने के निर्णय का सीमा प्रबंधन पर हमारे वर्तमान द्विपक्षीय व्यवस्थाओं और सीमा से जुड़े सवालों पर प्रभाव पड़ेगा जो हमारे लिए चिंता का विषय है।’ विशेषज्ञ बोले- भारत का बयान 'कमजोर'रक्षा और विदेशी मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने भारत के बयान को 'कमजोर और भ्रमित करने वाला' करार दिया है। उन्होंने कहा, 'भारत का विदेश मंत्रालय पीआरसी के नए भूमि सीमा कानून को 'एकतरफा कदम' कहता है। लेकिन ऐसे में समय में जब भारत सीमा पर पीआरसी के आक्रमक रवैये का सामना कर रहा है, उसका कहना है कि इस कदम का सीमा पर 'शांति' बनाए रखने सहित द्विपक्षीय व्यवस्थाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जितना चाहे उतना पानी रोक सकता है चीनउन्होंने ट्विटर पर लिखा, 'पिछले साल से कई बिंदुओं पर भारत के साथ तनावपूर्ण सैन्य गतिरोध के बीच पीआरसी ने नया कानून पारित किया है। स्पष्ट रूप से भारत के खिलाफ पीआरसी की स्थिति का लाभ उठाने के लिए डिजाइन किया गया है। यह कानून तिब्बत जैसे पीआरसी के क्षेत्र से बहने वाले के कब्जे सीमापार नदी के जल तक फैला हुआ है (जिसे विदेश मंत्रालय नोट करने में विफल रहा)। ब्रह्मा चेलानी ने कहा, 'कानून की शब्दावली के अनुसार, पीआरसी की सीमाओं के भीतर उत्पन्न होने वाली अंतरराष्ट्रीय नदियों का साझा जल 'आंतरिक जल' है। सीमा पार के पानी पर संप्रभुता के दावे का मतलब है कि पीआरसी को जितना चाहें उतना साझा जल रोकने का अधिकार होगा।


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