Sunday, 5 December 2021

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मॉस्को/नई दिल्ली रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चंद घंटों में भारत पहुंचने वाले हैं। उनकी भारत यात्रा पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी हुई हैं। भारत और रूस के संबंधों पर पिछले कई साल से सवाल भी उठते रहे हैं। खुद रूस के शीर्ष नेतृत्व ने कई बार भारत के साथ रिश्तों को कमजोर करने के लिए खुलकर अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया था। इसके बावजूद दोनों देश जानते हैं कि उनके रिश्ते 70 साल से भी अधिक पुराने हैं। इसी साल भारत और रूस ने शांति, मित्रता और सहयोग संधि की 50वीं वर्षगांठ मनाई है। यही वह संधि थी जिसने 1971 के युद्ध के रूख को मोड़ दिया था। 1971 में भारत और रूस ने संधि पर किए थे हस्ताक्षर 9 अगस्त 1971 को भारत और तत्कालीन सोवियत संघ (वर्तमान रूस) ने चिरंजीवी दोस्ती के कागजों पर हस्ताक्षर किए थे। यही वह संधि थी जिसकी ताकत ने तत्कालीन विश्व के समीकरण में आमूल परिवर्तन कर दिए। इतना ही नहीं, इससे न केवल दक्षिणी एशिया बल्कि अमेरिका और यूरोपीय देशों की विदेश नीति को भी प्रभावित किया था। उस समय वैश्विक महाशक्ति और दादागिरी पर उतारू अमेरिका को भी अपनी रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। भारत के मुश्किल समय में रूस ने निभाई थी दोस्ती 1971 में भारत के लिए हालात बिल्कुल भी अनुकूल नहीं थे। एक तरफ जहां तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों से त्रस्त जनता भारत में शरण लेने के लिए घुसी जा रही थी। वहीं, पाकिस्तान, अमेरिका और चीन का गठबंधन मजबूत होता जा रहा था। ऐसे में तीन दिशाओं से घिरे भारत की सुरक्षा को बड़ा खतरा पैदा हो गया था। अमेरिका और चीन दोनों ही प्रतिबंधों के बावदूद पाकिस्तान को चोरी-छिपे हथियार देकर सैन्य मदद कर रहे थे। रूसी विदेश मंत्री ने भारत आकर किए थे समझौते पर हस्ताक्षर ऐसे में सोवियत संघ के विदेश मंत्री अंद्रेई ग्रोमिको भारत आए और 1971 को आज ही के दिन उन्होंने भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह के साथ सोवियत-भारत शांति, मैत्री और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए। यह संधि दोनो देशों के दोस्ताना संबंधों में एक मील का पत्थर बन गई। इस संधि के तुरंत बाद सोवियत संघ ने ऐलान किया था कि भारत पर हमला उसके ऊपर हमला माना जाएगा। यही वह कारण है जिससे 1971 युद्ध के दौरान अमेरिकी नौसैनिक बेड़े को भारत के ऊपर हमला करने की हिम्मत नहीं हुई। रूसी मिसाइल अटैक बोट से भारत ने कराची को किया था तबाह 1971 के युद्ध में भारतीय नौसेना ने रूस से खरीदे गए मिसाइल अटैक बोट से पाकिस्तान के कराची बंदरगाह को तबाह कर दिया था। इतना ही नहीं, भारत ने तो पाकिस्तानी नौसेना की रीढ़ कही जाने वाली पीएनएस खैबर को डूबो दिया था। भारत के इन मिसाइल बोटों से पाकिस्तान इतना डर गया था कि उसने अपने सभी जहाजों को कराची बंदरगाह पर बुला लिया था। 1971 के युद्ध में भारतीय नौसेना का प्रभुत्व पूरे अरब सागर पर हो गया था। भारत की मंजूरी के बिना कोई भी जहाज न तो अरब सागर में आ सकता था और न ही बाहर जा सकता था। अमेरिका पर भारत से दोस्ती तोड़ने का आरोप रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पिछले साल दिसंबर में कहा था कि अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के कारण रूस के साथ भारत की करीबी साझेदारी एवं विशेष संबंध कमजोर हो रहे हैं। रूस की सरकारी थिंक टैंक रशियन इंटरनेशनल अफेयर्स काउंसिल के एक कार्यक्रम में लावरोव ने आरोप लगाया था कि अमेरिका के कारण भारत हमसे दूर होता जा रहा है।


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