जेनेवा के सबसे पहले सामने आने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और चीन तेजी से प्रतिक्रिया दे सकते थे। इंडिपेंडेंट पैनल फॉर पैन्डेमिक प्रिपेयर्डनेस ऐंड रिस्पॉन्स (IPPR) ने अपनी दूसरी रिपोर्ट में यह टिप्पणी की है। रिपोर्ट में इस बात पर दुख जताया गया है कि महामारी को छिपाने के कारण यह दुनियाभर में फैली। महामारी के केस फैलने के शुरुआती मामलों को स्टडी करने से संकेत मिले हैं कि इसे रोकने के लिए पहले कदम उठाए जा सकते थे। गंभीरता से उठा सकता था कदम रिपोर्ट के मुताबिक पैनल ने यह पाया है कि साफतौर पर चीन में स्थानीय और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रशासन जनवरी में ही तेजी से और गंभीरता के साथ कदम उठा सकता था। पैनल ने महामारी की शुरुआत में WHO के ढीले रवैये की भी आलोचना की है। इसका कहना है कि WHO ने 22 जनवरी तक इमर्जेंसी मीटिंग ही नहीं की थी। तब भी कमिटी ने इसे इमर्जेंसी करार देने में एक हफ्ते का समय लगा दिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कमिटी ने ऐसा क्यों किया, यह साफ नहीं है। 'CCP ने झूठ फैलाने में झोंकी ताकत' इससे पहले अमेरिका के गृह विभाग ने एक रिपोर्ट जारी कर वुहान स्थित वायरॉलजी इंस्टिट्यूट पर कई सवाल उठाए हैं और गहन जांच की मांग की है। इस रिपोर्ट में अमेरिका ने आरोप लगाया है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने व्यवस्थागत तरीके से कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति कैसे हुई, इसकी पारदर्शिता के साथ जांच होने से रोकी और झूठ फैलाने में अपनी ताकत झोंक दी। '2019 में बीमार हो गए थे रिसर्चर' रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी सरकार के पास यह मानने के लिए पर्याप्त वजह है कि महामारी के पहले केस की पहचान से पहले वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी में कई रिसर्चर 2019 में बीमार हो गए थे। आरोप लगाया गया है कि CCP ने पहले भी स्वतंत्र पत्रकारों, जांचकर्ताओं और वैश्विक हेल्थ अथॉरिटीज को WIV में रिसर्चर्स से पूछताछ करने से रोका है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो 2019 में बीमार पड़े थे।
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