वॉशिंगटन में हजारों किलोमीटर वर्गमील इलाके में फैले बर्फ के सफेद चादर के ऊपर अजीब आकृति इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिक भी बर्फ के ऊपर बनी मीलों लंबी इस दांतेदार संरचना की जांच पड़ताल कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि बर्फ पर यह आकृति किसी वस्तु के तेजी से नीचे उतरने और मीलों तक घिसटने के कारण बनी है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस दावे पर संदेह जाहिर किया है। दांतेदार बर्फीली संरचना से वैज्ञानिक भी हैरान एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके ने अपनी रिपोर्ट में साइंस चैनल के कार्यक्रम व्हाट ऑन अर्थ के हवाले से लिखा कि यह तस्वीर देखने में किसी वस्तु के टकराने से निर्मित हुई प्रतीत होती है। एविएशन जर्नलिस्ट जो पप्पालार्डो ने बताया कि हो सकता है कि वहां कोई चीज तेजी से उतरी हो, जिससे बर्फ में ऐसी संरचनाएं बन गई हों। उन्होंने न्यूजीलैंड के यात्री विमान के 1979 में बर्फीले तूफान में दुर्घटनाग्रस्त होने वाली घटना का भी हवाला दिया। इस दुर्घटना को माउंट एरेबस डिजास्टर के नाम से भी जाना जाता है। नासा के वैज्ञानिक ने बताया दुर्लभ ग्लेशियर नासा के वैज्ञानिक डॉ केली ब्रंट अक्सर अंटार्कटिका के इलाके में शोध कार्यक्रमों के लिए जाती रहती हैं। उन्होंने बताया कि मैकमुर्डो साउंड के जमे हुए समुद्र में दांतेदार बर्फ की सात मील लंबी दीवार दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि यह एक दुर्लभ प्रकार का ग्लेशियर है। जो जमे हुए समुद्रों में माउंट एरेबस से बहने वाली लाखों टन बर्फ से मिलकर बना है। क्या था माउंट एरेबस डिजास्टर 28 नवंबर, 1979 को 7.21 बजे, एयर न्यूजीलैंड की उड़ान 901 अंटार्कटिका के दर्शनीय स्थलों की यात्रा पर ऑकलैंड हवाई अड्डे से रवाना हुई थी। उड़ान के कुछ घंटे बाद ही विमान के पायलटों ने अच्छे मौसम और साफ दृश्यता का रिपोर्ट दिया था। लेकिन जैसे ही विमान माउंट एरेबस के पास पहुंचा, पायलटों को एक अजीब और भयानक ऑप्टिकल भ्रम ने घेर लिया। इस दौरान उन्हें चारों तरफ केवल सफेद ही सफेद नजर आने लगा। इसे व्हाइटआउट के रूप में जाना जाता है। 257 लोगों की हुई थी मौत भूवैज्ञानिक डॉ एलन लेस्टर ने बताया कि व्हाइटआउट के दौरान आपको केवल सफेद रंग ही दिखाई देता है। यह बस एक ऐसी स्थिति होती है जहां हर जगह सफेद ही दिखाई देता है। नीचे सफेद ग्लेशियर और ऊपर सफेद बादल के कारण यह घटना होती है। इस दौरान ऊपर या नीचे क्या है यह पता नहीं चल पाता। इस दुर्घटना में 237 यात्रियों के साथ प्लेन के 20 क्रू मेंबर्स की मौत हो गई थी। हर साल अंटार्कटिका पहुंचते हैं हजारों शोधकर्ता बर्फ का जमा हुए रेगिस्तान (अंटार्कटिका) में हर साल करीब 1,000 से अधिक शोधकर्ता पहुंचते हैं। ये यहां के छिपे हुए रहस्यों का पता लगाने के अलावा जलवायु परिवर्तन की निगरानी भी करते हैं। इस क्षेत्र में कुछ जगहों पर तो तापमान माइनस 90 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। कठोर भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अंटार्कटिका के कई क्षेत्रों की निगरानी तो केवल सैटेलाइट्स के जरिए ही की जाती है।
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