मेक्सिको मेक्सिको की खाड़ी में पाई जाने वाली बलीन वेल की एक प्रजाति, राइस वेल पर अभी से खतरा मंडराने लगा है जबकि इसकी पहचान हाल ही में की गई है। अमेरिकी एक्सपर्ट्स राइस वेल के खोपड़े के अनैलेसिस से इसमें और दूसरी बलीन वेल प्रजातियों में अंतर करने में सफल रहे हैं। राइस वेल को पहले ब्राइडी वेल की उपप्रजाति माना जाता था। हालांकि, अब इसे अलग प्रजाति माना गया है। बची हैं सिर्फ 100 वेल वहीं, वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके सिर्फ 100 सदस्य ही बचे हैं। इन्हें तेल लीक होने, जहाजों के साथ दुर्घटना, महासाहर के मलबे और मछली पकड़ने के उपकरणों में फंसने से खतरा होता है। राइस वेल की आबादी कम है और यह सीमित जगह पर पाई जाती हैं जिससे इनके ऊपर मंडरा रहा खतरा बढ़ता जाता है। पहले इसे विलुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में रखा गया था और अब इसे सुरक्षित करार दिया गया है। इसके साथ ही स्तनपायी जीवों के संरक्षण के कानून के तहत भी सुरक्षित करार दिया गया है। कैसे पता चला अलग प्रजाति है साल 2008 में NOAA की फिशरीज साइंटिस्ट और स्टडी ऑदर डॉ. पट्रीशिया रोसेल ने जेनेटेक डेटा के आधार पर पाया था कि यह दूसरी वेल से अलग है। उन्होंने 2014 में एक स्टडी में पाया था कि राइस वेल अलग प्रजाति है। अब इनके खोपड़े को स्टडी किया गया है जिससे पता चला है कि इनमें और ब्राइडी वेल में क्या अंतर है। इसके दूसरी वेल से नापा गया था। इसके बाद जेनेटिक अनैलेसिस में भी दूसरी प्रजातियों से अंतर पाया गया। कैसे पड़ा नाम इस वेल का वैज्ञानिक नाम Balaenoptera ricei और आम नाम Rice's अमेरिका के मशहूर बायॉलजिस्ट डेल राइस के नाम पर रखा गया है जिन्होंने 60 साल के करियर में मरीन मैमेल साइंस पर काम किया था। राइस का निधन 2017 में हो गया था और वह इस मेक्सिको की खाड़ी में इस प्रजाति की पहचान करने वाले पहले रिसर्चर थे। डॉ. रोजेल और उनकी टीम ने मरीन मैमेल साइंस में साइंटिफिक पेपर में अनैलेसिस छापा है।
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