पड़ोसी देश नेपाल व्यवस्था के एक और संकट में उलझते-उलझते रह गया है। विश्लेषक आदतन इसे राजनीतिक संकट ही कह रहे हैं, लेकिन बीमारी उससे कहीं आगे की थी और उसका पूरा निदान भी अभी नहीं हो पाया है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने बीते 20 दिसंबर को संसद भंग करने की सिफारिश कर दी थी और राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने तत्काल इस पर अपनी मोहर भी लगा दी थी। हड़बड़ी का आलम यह कि संसद का सामना किए बगैर मई 2021 में नई प्रतिनिधि सभा का चुनाव कराने की घोषणा कर दी गई। गनीमत है कि इसी 23 फरवरी को नेपाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से ओली के कदम को गलत करार देते हुए उन्हें 13 दिन के अंदर संसद का विश्वास प्राप्त करने का आदेश दिया है।
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