उलानबटार डायनासोर का नाम लेते ही हमारे जेहन में एक दैत्याकार जीव का ख्याल आता है। हालांकि सभी डायनासोर विशालकाय हों, यह जरूरी नहीं है। मंगोलिया के रेगिस्तान में आज से करीब 6.5 करोड़ साल पहले शुवूइया प्रजाति के डायनासोर पाए जाते थे। मुर्गे के आकार के ये डायनासोर देखने में बहुत छोटे होते थे लेकिन एक ताकत उन्हें दूसरे डायनासोर से जुदा करती थी। के अंदर रात में भी देखने और उल्लू की तरह से सुनने की 'असाधारण' क्षमता थी जिससे वे आसानी से अंधेरे में भी शिकार करते थे। शुवूइया डायनासोर के जीवाश्म को लेकर हुए ताजा शोध में पता चला है कि मुर्गे के आकार वाला इस डायनासोर तुलनात्मक रूप से अन्य डायनासोर में सबसे बड़ी थी। विशेषज्ञों ने बताया कि शुवूइया डायनासोर दो पैरों पर चलने वाला (Theropod) डायनासोर था। इसी श्रेणी में बेहद खतरनाक समझे जाने वाले टिरैनसॉरस रेक्स भी आते थे। शुवूइया की खोज आज से 20 साल पहले हुई थी लेकिन तब से लेकर अभी तक यह दो फुट का डायनासोर वैज्ञानिकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय बना शुवूइया चिड़िया की तरह से खोपड़ी, भूरी भुजाएं और हर हाथ में एक नाखून वाले शुवूइया की हड्डियां सभी डायनासोर में सबसे अनोखी हैं। इसकी इसी विशेषता की वजह से वर्ष 1998 से लेकर अब तक यह वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है। इस शोध के लेखकों का मानना है कि शुवूइया डायनासोर रात में शिकार करने निकलते थे। वे अपने कानों और आंखों का इस्तेमाल करके छोटे जीवों और कीड़ों का शिकार करते थे। यह कुछ उसी तरह से है जैसे आधुनिक समय में रेगिस्तान में पशु करते हैं। यह डायनासोर अपनी लंबी टांगों का इस्तेमाल तेजी से दौड़ने के लिए करता था। इस शोध के लेखक दक्षिण अफ्रीका के प्रफेसर जोनाह चोइनिअरे ने कहा कि रात में शिकार पर निकलना, खुदाई की क्षमता आदि आधुनिक समय में रेगिस्तान में पाए जाने वाले जीवों की विशेषता है। आश्चर्य की बात यह है कि ये सभी गुण उस समय केवल एक डायनासोर प्रजाति में पाए जाते थे। यह प्रजाति आज से करीब 6.5 साल पहले पाई जाती थी। बता दें कि आज के समय उल्लू जैसे कुछ ही जीव रात में शिकार करने में सक्षम हैं।
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