Thursday, 20 May 2021

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कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए चीन ने 2060 तक कार्बन-न्यूट्रल बनने का लक्ष्य तैयार किया है। इसके लिए वह अक्षय-ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाएगा जिसका एक बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा है। चीन दो रिएक्टर बनाने जा रहा है जिसमें से पहले का निर्माण जारी है। यह 2023 में और दूसरा 2026 में ऊर्जा के लिए इस्तेमाल में आ सकता है। यह निर्माणाधीन रिएक्टर जहां बनाया जा रहा है वह चांगबियाओ टापू हाल ही में चर्चा में आया है। इसके पीछे कारण यह है कि चीन ने पिछले कुछ साल में परमाणु ऊर्जा को लेकर अपने काम में पारदर्शिता नहीं रखी है और डेटा शेयर करना बंद कर दिया है।

चीन ने इंटरनैशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) में नागरिक इस्तेमाल के लिए प्लूटोनियम स्टॉक का जायजा 2017 से देना बंद कर दिया है और एजेंसी के डेटाबेस पर रिएक्टर्स का जिक्र भी नहीं किया गया है।


Chinese Nuclear Reactor: क्लीन एनर्जी के नाम पर परमाणु हथियार बनाने की तैयारी में चीन? एक्सपर्ट्स को ड्रैगन पर शक

कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए चीन ने 2060 तक कार्बन-न्यूट्रल बनने का लक्ष्य तैयार किया है। इसके लिए वह अक्षय-ऊर्जा और गैर-जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाएगा जिसका एक बड़ा हिस्सा परमाणु ऊर्जा है। चीन दो रिएक्टर बनाने जा रहा है जिसमें से पहले का निर्माण जारी है। यह 2023 में और दूसरा 2026 में ऊर्जा के लिए इस्तेमाल में आ सकता है। यह निर्माणाधीन रिएक्टर जहां बनाया जा रहा है वह चांगबियाओ टापू हाल ही में चर्चा में आया है। इसके पीछे कारण यह है कि चीन ने पिछले कुछ साल में परमाणु ऊर्जा को लेकर अपने काम में पारदर्शिता नहीं रखी है और डेटा शेयर करना बंद कर दिया है।



क्या है चीन का प्लान?
क्या है चीन का प्लान?

चीन यहां यह CFR-600 सोडियम-कूल्ड फास्ट न्यूट्रॉन न्यक्लियर रिएक्टर बना रहा है। इसमें प्लूटोनियम पैदा किया जाएगा जिसे रीप्रोसेस करके दूसरे न्यूक्लियर रिएक्टर्स के लिए ईंधन तैयार किया जाएगा। अल-जजीरा की रिपोर्ट में बताया गया है कि इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए भी किया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी अधिकारियों का प्रॉजेक्ट को देख रहीं कंपनियों को छोड़कर कोई बाहरी यह नहीं बता सकता कि प्लूटोनियम का इस्तेमाल नागरिकों को ऊर्जा आपूर्ति के लिए किया जाना है या देश को परमाणु हथियार पहुंचाने के लिए।



चीन पर शक क्यों?
चीन पर शक क्यों?

दरअसल, यह सवाल चर्चा में इसलिए आया है क्योंकि अमेरिका के एक अधिकारी ने चीन पर आरोप लगाया है कि वह परमाणु खतरे को कम करने के लिए द्विपक्षीय बातचीत को टाल रहा है। चीन ने इंटरनैशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) में नागरिक इस्तेमाल के लिए प्लूटोनियम स्टॉक का जायजा 2017 से देना बंद कर दिया है और एजेंसी के डेटाबेस पर रिएक्टर्स का जिक्र भी नहीं किया गया है। अभी तक के आकलन के आधार पर माना जाता है कि चीन के पास 300-350 परमाणु हथियार हैं।



प्लूटोनियम का इस्तेमाल कहीं और?
प्लूटोनियम का इस्तेमाल कहीं और?

प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में साइंस और ग्लोबल सिक्यॉरिटी प्रोग्राम के सह-संस्थापक और सीनियर रिसर्च फिजिसिस्ट फ्रैंक वॉन हिपेल का कहना है कि IAEA के सदस्य कभी-कभी जानकारी देने में देर कर देते हैं लेकिन चीन की पार्दर्शिता में कमी से दुनियाभर की सरकारें और एक्सपर्ट्स चिंतित हैं। वॉन और उनके साथियों ने एक रिसर्च पेपर में दावा किया है कि इस न्यूक्लियर प्रोग्राम के सहारे 2030 तक चीन 1,270 हथियार तैयार कर सकता है। अगर चीन ने ज्यादा शुद्ध यूरोनियम या कंपोजिट यूरेनियम-प्लूटोनियम कोर का इस्तेमाल बम और मिसाइलों में किया तो यह खतरा और भी बढ़ जाएगा।



महंगा तरीका, फिर भरोसा क्यों?
महंगा तरीका, फिर भरोसा क्यों?

रिपोर्ट में कहा गया है चीन की 4.9% ऊर्जा परमाणु स्रोत से आती है। 2070 तक इसे 13% करने का प्लान है। 2025 तक 70 गीगावॉट क्षमता इंस्टॉल करने का चीन का लक्ष्य है जो अभी 51 गीगावॉट है। चीन में अभी 50 न्यूक्लियर रिएक्टर हैं 14 पारंपरिक रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। हालांकि, वॉन समेत दूसरे एक्सपर्ट्स का कहना है कि दूसरे देशों में यह देखा गया है कि रीप्रोसेसिंग लागत के हिसाब से परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए सही तरीका नहीं है। ऐसे में चीन इस पर ध्यान क्यों दे रहा है, यह बड़ा सवाल है। एक्सपर्ट्स को इसी लिए डर है कि चीन दरअसल इन रिएक्टर्स से दो फायदे लेना चाहता है।





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