रामल्ला इजरायल में 12 साल बाद सत्ता की डोर के हाथ से निकलने जा रही है। यामिना पार्टी के अध्यक्ष नफ्ताली बेनेट इजरायल में नई सरकार बनाएंगे। इस पूरे घटनाक्रम पर दुनियाभर की निगाहें तो टिकी ही हैं, फिलिस्तीन को शायद यह देखने का सबसे ज्यादा इंतजार होगा कि सत्ता परिवर्तन से उसके हालात पर क्या असर पड़ता है। खासकर तब जब देश के अंदर नए प्रधानमंत्री को लेकर फिलहाल बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। टाइम्स ऑफ इजरायल से दो सीनियर नेताओं ने कहा है कि उन्हें बहुत ज्यादा बदलाव होता नहीं दिख रहा है। और ज्यादा कट्टर होंगे नए PM? फतब सेंट्रल कमिटी का हिस्सा रह चुके नासिर अल-किदवा के मुताबिक हो सकता है बेनेट और ज्यादा कट्टरपंथी ही साबित हों। नासिर फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के आलोचक हैं। येश यतीद चीफ यैर लापिद के साथ अभी तक के समझौते के मुताबिक बेनेट बारी-बारी से PM पद संभालेंगे। इस बारे में अंतिम फैसला अभी किया जाना है। लापिद के मुताबिक अभी नई सरकार बनने के रास्ते में कुछ दिक्कतें हैं। फिलिस्तीन के लिए चिंता का सबब नफ्ताली? रामल्ला में सीनियर नेता मुस्तफा बरगउती के मुताबिक नेतन्याहू के पद से हटने का एक फायदा यह हो सकता है कि अब उनके खिलाफ चल रहे केस आगे बढ़ सकेंगे। नेतन्याहू पर रिश्वत, धोखाधड़ी और विश्वास तोड़ने के आरोप हैं। हालांकि, उनका कहना है कि बेनेट की सरकार उनके (फिलिस्तीन के) लिए चिंताजनक साबित हो सकती है क्योंकि वह शांति कायम करने में कामयाब नहीं होगी। फिलिस्तीन की समस्या से बचने का फायदा नहीं बेनेट ने रविवार को कहा था कि गठबंधन दल आपस में सीमित मुद्दों पर ही सहमति कायम कर सकते हैं लेकिन वे न बातचीत बंद करेंगे और न अपना क्षेत्र किसी को दे देंगे। विपक्ष की बनने वाली सरकार में अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां शामिल हैं। ऐसे में गजा पट्टी, फिलिस्तीन, हमास, ईरान, लेबनान, हिजबुल्लाह, अमेरिका जैसे ज्वलंत मुद्दों को लेकर भी इन पार्टियों के विचार आपस में बंटे हुए हैं। फिलिस्तीन के नेताओं का कहना है कि इस तरह फिलिस्तीन की समस्या से बचने का किसी को फायदा नहीं होगा। नेतन्याहू के खिलाफ एकजुट हुआ है विपक्ष विपक्षी गठबंधन की सरकार बनाने की जिम्मेदारी उठा रहे लापिद के पास देश की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में से 61 सांसदों का मामूली समर्थन है जबकि सामने चुनौतियां कई हैं लेकिन उसे उम्मीद है कि यह बहुमत मजबूती के साथ कायम रहेगा क्योंकि इसके पीछे 2009 से लगातार 12 सालों से देश की निर्बाध रूप से कमान संभाल रहे नेतन्याहू को हटाने का 'एकजुटता का उद्देश्य' है। रोचक बात यह है कि नेतन्याहू को पद से हटाने के लिए एकजुट हुए लोगों में से एक तिहाई वैचारिक तौर पर उनके 'प्राकृतिक सहयोगी' हैं और पूर्व में उनके करीबी सहयोगियों के तौर पर काम भी कर चुके हैं।
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