Friday, 8 October 2021

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पेइचिंग कोरोना वायरस की शुरुआत साल 2019 में हुई थी। चीन से शुरू हुए इस वायरस ने पूरी दुनिया को घरों के भीतर कैद कर दिया। देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दी और बड़े पैमाने पर यात्रा बंद कर दी। हालांकि अब जब चीजें सामान्य हो रही हैं तो लोग विदेशी यात्राएं कर रहे हैं। लेकिन कोरोना वायरस की शुरुआत के बाद से विदेशी यात्रा करने से परहेज कर रहे हैं। कोरोना वायरस को अस्तित्व में आए हुए दो साल होने वाले हैं और इसके बाद से ही जिनपिंग चीन से बाहर नहीं गए हैं। रिपोर्ट्स कह रही हैं कि उन्हें डर सता रहा है लेकिन किसका? चीन के वुहान शहर से साल 2019 में कोरोना वायरस की शुरुआत हुई, जिसके बाद जिनपिंग ने देश से बाहर जाना बंद कर दिया। उनकी आखिरी विदेशी यात्रा 17-18 जनवरी 2020 में म्यांमार की थी। चीन और भारत का पड़ोसी मुल्क म्यांमार फरवरी से ही सैन्य सरकार की गिरफ्त में है। म्यांमार यात्रा के कुछ दिन बाद जिनपिंग सरकार ने कोरोना महामारी को स्वीकार किया और हुबेई प्रांत को पूरी तरह बंद कर दिया। कोरोना के बाद हुई थी चौतरफा आलोचनाकोरोना वायरस की वजह से चीन को वैश्विक स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा था। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में तो चीन के खिलाफ जांच की भी मांग की थी। इससे चीन की अंतरराष्ट्रीय छवि को काफी नुकसान पहुंचा था। क्या इसीलिए जिनपिंग दूसरे देशों में जाने से डर रहे हैं? भारत के रक्षा मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने एक ट्वीट कर कहा कि कुछ रिपोर्ट्स चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर सत्ता के संघर्ष को लेकर दावा कर रही हैं। एक साल 9 महीने से नहीं रखा बाहर कदमउन्होंने कहा कि अगर ये दावे सच हैं तो चीन में 'एक-व्यक्ति शासन' युग की वापसी के बावजूद शी जिनपिंग न ही 'सर्वशक्तिमान' हैं और न ही 'अजेय'। इसका कारण उनके घर के भीतर मौजूद दुश्मनों की संख्या है। जिनपिंग ने एक साल 9 महीने से चीन से बाहर कदम नहीं रखा है। वह रोम जी-20 समिट में भी हिस्सा नहीं लेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन शी जिनपिंग के साथ व्यक्तिगत रूप से द्विपक्षीय वार्ता करना चाहते थे लेकिन जिनपिंग ने ऑनलाइन मीटिंग के लिए सहमति जताई है। सवाल ये उठते हैं कि क्या जिनपिंग को चीन से बाहर जाने में तख्तापलट का डर सता रहा है। देश की हालत उथल-पुथलकम्युनिस्ट पार्टी के बाहर चीन के हालात भी उथल-पुथल से भरे हुए हैं। सरकार जैक मा जैसे देश के बड़े बिजनस टाइकून्स पर धड़ल्ले से कार्रवाई कर रही है जिससे देश की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट्स का दावा है कि सरकार नहीं चाहती कि देश के अरबपति एक बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सामने आए जिनका राजनीति में भी दखल हो। अक्टूबर में अपनी आर्थिक योजनाओं पर एक प्रमुख भाषण में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने स्वीकार किया कि देश का विकास असंतुलित है और कहा कि साझा समृद्धि अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। बीजिंग के पास अरबपतियों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के हथकंडे हैं, जिनमें सबसे चरम मामलों में नजरबंदी भी शामिल है। पार्टी के सदस्यों के लिए एक आंतरिक अनुशासनात्मक प्रक्रिया, जिसे शुआंगगुई के नाम से जाना जाता है, का इस्तेमाल अतीत में कुछ टाइकून के लिए किया गया है। तकनीकी दिग्गजों के व्यवहार को प्रभावित करने के लिए अविश्वास, साइबर सुरक्षा और अन्य नियामकों द्वारा जांच अधिक सामान्य तरीके हैं। पड़ोसी देशों के साथ चीन के संबंध खराबचीन के लिए अंतरिक हालातों के साथ-साथ बाहरी परिस्थितियां भी चुनौतीपूर्ण हैं। क्या ताइवान और क्या जापान सभी पड़ोसी देशों के साथ चीन का सीमा विवाद चल रहा है। भारत के साथ तनावपूर्ण हालातों में पिछले साल से ही एलएसी पर दोनों देशों की सेनाएं तैनात हैं। जबकि जापान के साथ विवाद की वजह साउथ चाइना सी है जिसके एक प्रमुख द्वीप को चीन अपना बता रहा है। फिलहाल ताइवान चीन के गले की सबसे बड़ी हड्डी बना हुआ है। ताइवान से युद्ध जैसे हालातताइवान के साथ चीन के युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। बीते दिनों चीन ने एक साथ 52 फाइटर जेट ताइवान की ओर भेज दिए। अब तक करीब 150 चीनी फाइटर जेट ताइवान रक्षा क्षेत्र की ओर भेजे जा चुके हैं। सामने से ताइवान ने भी जंग की तैयारी का ऐलान कर दिया है। चीन का कहना है कि ताइवान आजादी का सपना छोड़कर उसकी गुलामी को स्वीकार कर ले। चीन ताइवान की आजादी को 'युद्ध' करार दे चुका है। वहीं ताइवान एक स्वतंत्र देश के दावे पर बरकरार है। ताइवान को अमेरिका का साथ हासिल है जबकि चीन के लिए अमेरिका और पश्चिमी देश सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं। ब्रिटेन में हुए जी-7 सम्मेलन में दुनिया के सात विकसित देशों में एक साझा विज्ञप्ति जारी करते हुए चीन मानवाधिकार और महामारी जैसे कई मुद्दों पर मिलकर घेरा था। ऐसे हालातों में चीनी राष्ट्रपति के लिए देश छोड़कर जाना और भी ज्यादा मुश्किल है।


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