इस्लामाबाद पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख की नियुक्ति को लेकर भी इमरान खान और सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा आमने-सामने आ गए थे। पाकिस्तानी सेना ने हाल में ही प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन (TLP) के खिलाफ कार्रवाई करने के इमरान खान के आदेश को मानने से इनकार कर दिया था। टीएलपी ने अप्रैल और अक्टूबर में लाहौर, कराची, इस्लामबाद सहित पाकिस्तान के कई हिस्सों में जमकर बवाल काटा था। टीएलपी के साथ समझौते को सार्वजनिक करेगी पाक सरकार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, सेना के इस फैसले से आहत इमरान खान सरकार अब टीएलपी के साथ किए गए समझौते को 10 दिन के अंदर सार्वजनिक करने की तैयारी में है। सोमवार को राष्ट्रीय सुरक्षा पर संसदीय समिति की कार्यवाही के दौरान इस समझौते को सार्वजनिक करने का फैसला लिया गया। अप्रैल में भी पाकिस्तान सरकार ने टीएलपी के कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकते हुए समझौता किया था। उस समय तो पाकिस्तान में गृहयुद्ध की नौबत आ गई थी। टीएलपी ने कई पुलिसकर्मियों को भी कैद कर रखा था। बताया- TLP से क्यों किया समझौता और गुप्त क्यों रखा रिपोर्ट में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि पाकिस्तान सरकार और टीएलपी के बीच समझौता कैसे हुआ और इतने दिनों तक इसको गुप्त क्यों रखा गया। सैन्य अधिकारियों ने कहा कि उनका प्राथमिकता सड़कों पर कब्जा किए बैठे टीएलपी के दंगाइयों को हटाना था। पाकिस्तानी सेना हर हाल में स्थिति को काबू करना चाहती थी। समझौते को गुप्त रखने पर बताया गया कि सरकार और सेना को डर था कि अगर प्रारंभिक समझौते को सार्वजनिक किया गया तो बहस शुरू हो सकती है। इतना ही नहीं, इससे समझौते पर अमल करने में भी दिक्कत आ जाती, जिससे उपद्रव के और भड़कने का खतरा था। टीएलपी के प्रदर्शन को देख इमरान खान के उड़ गए थे होश सरकार की तरफ से बताया गया है कि अब टीएलपी ने अपने विरोध प्रदर्शनों को पूरी तरह से वापस ले लिया है। इसलिए, हम उचित मौका जानकर इस समझौते को सार्वजनिक करने के लिए तैयार हैं। समझौते के पहले के हालात के बारे में कहा गया कि टीएलपी के भारी-भरकम जूलुस को देखकर सरकार डर गई थी। ये लोग सड़कों पर खड़े किए गए बैरिकेड को पारकर लगातार राजधानी इस्लामाबाद की तरफ बढ़ रहे थे। उस समय सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि इन प्रदर्शनकारियों से कैसे निपटा जाए। इमरान के कार्रवाई के आदेश को सेना ने नहीं माना इस घटनाक्रम पर बारीक नजर रखने वाले ने बताया कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने हालात को देखते हुए टीएलपी के प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग की अनुमति दे दी थी। लेकिन, सेना ने इमरान खान की सलाह को मानने से पहले खुद की एक उच्चस्तरीय बैठक बुला ली। इस बैठक में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के बाद पैदा होने वाले हालात पर चर्चा की गई। उन्होंने सलाह मशविरा किया कि अगर हम कानून तोड़ने वाले इन लोगों पर गोलियां चलाते हैं तो कितने हताहत हो सकते हैं, प्रदर्शनकारियों की तरफ से क्या प्रतिक्रिया आ सकती है। जिसके बाद सेना ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया था। जनरल बाजवा ने सरकार को गिनाई थी मजबूरी सूत्रों के अनुसार, सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने 29 अक्टूबर को हुई राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की बैठक में इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के एक होकर टीएलपी के कार्यकर्ताओं पर बल प्रयोग के सभी फायदे और नुकसान के बारे में बताया। जनरल बाजवा ने इमरान खान सरकार से कहा कि अगर वे लोग टीएलपी के खिलाफ बल प्रयोग की कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं तो सेना कार्रवाई करेगी। उन्होंने इस दौरान लाल मस्जिद और मॉडल टाउन की घटना का भी उल्लेख किया। टीएलपी का भारत से संबंध होने का दावा कर चुकी है पाक सरकार जब तक यह बैठक हुई, तब तक इमरान खान सरकार सख्त रुख अपना चुकी थी। पाकिस्तान के सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने 27 अक्टूबर को कैबिनेट की बैठक में प्रधानमंत्री इमरान खान के हवाले से कहा था कि सरकार किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने और चुनौती देने की अनुमति नहीं देगी। फवाद चौधरी ने टीएलपी को एक उग्रवादी संगठन करार दिया था। उन्होंने दावा किया था कि टीएलपी का भारत के साथ संबंध है। बाद में पाकिस्तान सरकार ने इसी टीएलपी के साथ समझौता कर सभी कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया था।
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