Monday, 22 November 2021

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बीजिंग चीन के राष्ट्रपति ने दक्षिण चीन सागर में जारी बवाल पर सफाई दी है। उन्होंने कहा कि चीन कभी भी दक्षिण पूर्व एशिया पर प्रभुत्व हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। इतना ही नहीं, चीनी राष्ट्रपति ने यहां तक दावा कर दिया कि उनका देश छोटे पड़ोसी देशों के साथ दबंगई नहीं करेगा। दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) की बैठक को संबोधन के दौरान किए गए जिनपिंग के इन दावों ने पूरी दुनिया को आश्चर्य में डाल दिया है। जिनपिंग ने क्या दावा किया? चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक शी ने कहा कि चीन प्रभुत्ववाद और सत्ता की राजनीति का दृढ़ता से विरोध करता है। वह अपने पड़ोसियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहता है। चीन संयुक्त रूप से इस क्षेत्र में स्थायी शांति बनाए रखने का पक्षधर है और निश्चित तौर पर वर्चस्व नहीं जमाएगा या छोटे देशों पर दबंगई नहीं करेगा। शी जिनपिंग का दावा कितना सच्चा? शी जिनपिंग का यह दावा चीनी सेना की आक्रामक कार्रवाईयों के कारण झूठा प्रतीत हो रहा है। चीनी सेना पूरे इलाके मे आक्रामक तरीके से गश्त कर रही है। इतना ही नहीं, अभी कुछ दिन पहले ही चीनी सेना ने फिलीपींस की दो नौकाओं पर पानी की बौछार की थी। यह नौका फिलीपींस की सेना के लिए जरूरी साजो-सामान लेकर जा रही थी। इससे पहले चीन ने दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर को तैनात किया था, जो जापान के काफी नजदीक गश्त लगा रहा था। कहां है दक्षिण चीन सागर? दक्षिण चीन सागर, प्रशांत महासागर के पश्चिमी किनारे से सटा हुआ है। चीन का दक्षिण-पूर्व हिस्सा इस सागर से छूता हुआ है। इस सागर के पूर्वी तट पर वियतनाम स्थित है जबकि पश्चिमी तट पर फिलीपींस का कब्जा है। साउथ चाइना सी के उत्तरी हिस्से में ताइवान स्थित है। यह सागर गल्फ ऑफ थाईलैंड और फिलीपीन सागर से भी जुड़ा हुआ है। चीन का दावा है कि साउथ चाइना सी का 80 फीसदी हिस्सा उसका है। चीन क्यों जमाना चाहता है अपना अधिकार कई देशों से जुड़े होने के कारण यह क्षेत्र दुनिया के कुछ सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। इस रास्ते से दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का 20 फीसदी आवागमन होता है। जिसकी कुल कीमत 5 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है। ऐसे में जिस भी देश का इस क्षेत्र पर प्रभुत्व हो जाएगा वह आर्थिक और सामरिक रूप से शक्तिशाली बनेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस समुद्र में 11 अरब बैरल प्राकृतिक गैस और तेल तथा मूंगे के विस्तृत भंडार मौजूद हैं। फिलीपींस के साथ द्वीपों को लेकर भिड़ा है चीन साउथ चाइना मॉर्निग पोस्ट ने मनीला के डिफेंस रिसर्चर जोस एंटोनियो कस्टोडियो के हवाले से लिखा है कि अगर इस क्षेत्र में जंग छिड़ती है तो फिलीपींस पर अमेरिका का अधिकार चलेगा। यहां की सरकार अमेरिका के किसी भी आदेश को मानने से इनकार नहीं कर पाएगी। इस देश की सेना कमजोर है और विदेश नीति भी सही नहीं है। यह दक्षिणी पूर्वी एशिया में अमेरिका के दो सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में से एक है। चीन-ताइवान की दुश्मनी तो जगजाहिर ताइवान भी खुलकर अमेरिका का साथ देगा। मेनलैंड चाइना से उसकी दुश्मनी जग जाहिर है। इस समय चीनी सेना ताइवान की खाड़ी में बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास कर रही है। चीनी लड़ाकू और टोही विमान भी आए दिन ताइवानी एयरस्पेस में घुसने की कोशिश करते हैं। ताइवान अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर है। ऐसे में कोई दो राय हो ही नहीं सकती कि ताइवान अमेरिका का साथ नहीं देगा। इंडोनेशिया के साथ भी चीन का विवाद इंडोनेशिया और चीन में द्वीपों को लेकर विवाद है। कुछ दिन पहले ही इंडोनेशियाई नौसेना ने अपने जलक्षेत्र में तीन दिन से घुसी चीनी तटरक्षक बल की नौका को खदेड़ दिया था। वहीं दूसरी तरफ इंडोनेशिया चीन की मुद्रा युआन का उपयोग बढ़ा रहा है। वह जिनपिंग की महत्वकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा भी है। ऐसे में यह कहना मुश्किल होगा कि इंडोनेशिया किसके पाले में जाता है। संभावना यह है कि वह इस स्थिति में तटस्थ रहना स्वीकार करेगा।


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