केपटाउन दुनियाभर में फ्लाइट को यात्रा का सबसे तेज साधन माना जाता है। वर्तमान में अलग-अलग देशों की सैकड़ों एयरलाइंस दुनिया के लगभग हर कोने में फ्लाइट सर्विस उपलब्ध करवा रही हैं। हालांकि, सातवें महाद्वीप अंटार्कटिका तक हवाई सेवाओं की पहुंच अभी तक मुश्किल ही साबित हुई है। दुनिया में चुनिंदा पायलट और विमान ही इस दुर्गम और वीरान इलाके में पहुंचने में सफल हुए है। अब इस कड़ी में एयरबस ए340 का नाम भी जुड़ गया है। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि अंटार्कटिका में एयरबस ए340 विमान ने लैंडिग की है। दुनिया का सबसे दुर्गम महाद्वीप है अंटार्कटिका अंटार्कटिका एक ऐसा दुर्गम महाद्वीप है, जहां अभी तक चुनिंदा देशों के हवाई जहाजों ने ही अपनी पहुंच बनाई है। अंटार्कटिका दुनिया का सबसे कम आबादी वाला महाद्वीप है। इस महाद्वीप में आमतौर पर गर्मियों में लगभग 4,400 लोग और सर्दियों में सिर्फ 1,000 लोग ही रहते हैं। इन लोगों को अलग-अलग देशों के रिसर्च स्टेशनों और टूरिस्ट कैंप में ठहराया जाता है। लोगों की दैनिक आवश्यक्ता की पूर्ति के लिए नियमित रूप से चार्टर्ड कार्गो जेट के जरिए रसद की आपूर्ति भी की जाती है। 2 नवंबर को अंटार्कटिका में लैंड हुआ था एयरबस ए340 एयरबस ए340 ने 2 नवंबर 2021 को पहली बार अंटार्कटिका में लैंड किया। इस विमान ने दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन से उड़ान भरी और साढ़े पांच घंटे में 2500 समुद्री मील का सफर करते हुए अंटार्कटिका पहुंचा। इस विमान को पुर्तगाल की कंपनी हाय फ्लाई संचालित करती है। विमान को अंटार्कटिका जाने के लिए लक्जरी कैंपसाइट वुल्फ फेंग ने चार्टर्ड बुकिंग की थी। इस विमान से कंपनी के अंटार्कटिका में मौजूद कैंपसाइड के लिए रसद और चिट्ठियां पहुंचाई गईं। इस विमान में अंटार्कटिका पहुंचने और वहां से वापस आने के लिए पर्याप्त मात्रा में जेट फ्यूल भरा गया था। पायलट ने बताई लैंडिंग की चुनौतियां हाय फ्लाई के वाइस प्रेसिडेंट और इस ऐतिहासिक उड़ान के कप्तान कार्लोस मीरपुरी के अनुसार, 3,000-मीटर के ग्लेशियर पर बने रनवे में जेट ब्रेक को आसान बनाने के लिए स्पेशल बंदोबस्त किए गए थे। बर्फ पर रबर के टायर आसानी से फिसल सकते हैं, ऐसे में उनपर स्पेशल कोटिंग और खांचे बनाए गए थे। उन्होंने कहा कि इस सतह पर विमान को उतारने से ज्यादा खतरनाक नीली बर्फ से टकराकर लौटती चकाचौंध रोशनी है। इससे पायलटों को जमीन पर कुछ भी दिखना बंद हो जाता है। सिर्फ एक्सपर्ट पायलट ही भर सकते हैं उड़ान उन्होंने बताया कि केपटाइन से प्रत्येक उड़ान में साढ़े पांच घंटे लगते थे और टीम ने अंटार्कटिका में 2500 समुद्री मील की दूरी तय करते हुए जमीन पर सिर्फ तीन घंटे से भी कम समय बिताया। तकनीकी रूप से एक हवाईअड्डा नहीं होने के बावजूद, वुल्फ्स फेंग की कैंपिंग साइट पर ब्लू-आइस रनवे को सी लेवल एयरपोर्ट नामित किया गया है। इसका मतलब है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के कारण केवल अत्यधिक विशिष्ट चालक दल ही वहां उड़ान भर सकते हैं। पहली बार 1828 में अंटार्कटिका पहुंची थी फ्लाइट अंटार्कटिका के लिए पहली रिकॉर्ड की गई उड़ान 1928 में लॉकहीड वेगा 1 मोनोप्लेन से भरी गई थी। इस विमान को एक ऑस्ट्रेलियाई सैन्य पायलट और खोजकर्ता जॉर्ज ह्यूबर्ट विल्किंस ने संचालित किया था। उन्होंने दक्षिण शेटलैंड द्वीप समूह में डिसेप्शन द्वीप से उड़ान भरी। इस प्रॉजेक्ट को अमीर अमेरिकी पब्लिशर और बिजनेस टाइकून विलियम रैंडोल्फ हर्स्ट ने फाइनेंस किया था। इस तरह की छोटी खोजपूर्ण उड़ानों से वैज्ञानिकों और मानचित्रकारों को अंटार्कटिका की स्थलाकृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां मिलीं। आज तक अंटॉर्कटिका पर कोई हवाई अड्डा नहीं बन सका है, लेकिन 50 लैंडिंग स्ट्रिप्स और रनवे जरूप मौजूद हैं।
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