काठमांडू नेपाल में एक बार फिर से राजनीतिक घटनाक्रम बहुत तेज हो गया है। चीन के इशारे पर चल रहे नेपाल की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को रविवार को पार्टी से निकाल दिया। शाम होते-होते प्रचंड को नेपाल के चुनाव आयोग ने करारा झटका दे दिया और पीएम ओली की बर्खास्तगी को खारिज कर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल के तेजी से बदलते घटनाक्रम में चीन के हस्तक्षेप से अस्थिरता बढ़ रही है और भारत के एक्टिव होकर काम करने की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर रहीस सिंह एनबीटी ऑनलाइन से कहते हैं कि चीन ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नेपाल को अस्थिर बना दिया है। उन्होंने कहा, ' में टूट हुई और वहां रोज घटनाक्रम बदल रहे हैं। इसका मतलब है कि आने वाले समय में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ेगी। नेपाल में जितनी अस्थिरता बढ़ेगी, उसके दो पहलू हैं। पहला-चीन को ऐक्टिव होने का मौका मिलेगा, वहीं दूसरा-हो सकता है कि भारत समर्थक ताकतों को फिर से उभरने का मौका मिले और वे भारत की ओर देखें।' 'नेपाली पीएम मौका परस्त नेता, भारत सक्रिय होकर काम करे' डॉक्टर सिंह ने कहा, 'चीन नेपाल को एक उपनिवेश के रूप में विकसित करना चाहता है जबकि भारत उसे अपना एक सनातन पड़ोसी के रूप में देखता है। भारत एक पड़ोसी के रूप में नेपाल को देखता है और उसके साथ अच्छे संबंध विकसित करना चाहता है। यह स्थिति दोनों के लिए एक अवसर है और अगर भारत सही राजनयिक कदम उठाए तो हो सकता है कि वहां ऐसी ताकतें फिर से विकसित हों जो भारत के साथ मिलकर चलें।' ओली के बदले रुख पर डॉक्टर सिंह ने कहा कि नेपाली पीएम मौका परस्त नेता है। आज नेपाल को भारत की जरूरत है लेकिन ओली को चीन की जरूरत है। इसकी वजह है कि पीएम ओली राजनीतिक विचार और संस्कृति से चीन के करीब हैं और चीन के इशारे पर ही उन्होंने अब तक काम भी किया है लेकिन नेपाल को भारत की जरूरत है। ओली को लेकर बहुत अच्छे परिणाम की उम्मीद नहीं है। आज जरूरत है कि भारत सक्रिय होकर काम करे तब वहां ज्यादा बेहतर परिणाम आएंगे। उधर, विशेषज्ञ भारत के नेपाल के आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करने के फैसले की भी प्रशंसा कर रहे हैं। वह भी तब जब चीन ने अपने नेताओं की पूरी फौज को नेपाल में उतार दिया है। चीन ने संकेत दिया है कि वह नेपाल में हस्तक्षेप को तैयार है लेकिन भारत न केवल इस पूरे विवाद से दूरी बनाए हुए है, बल्कि उसे कोरोना वैक्सीन भी दे रहा है। इससे पहले रविवार को नेपाल में चुनाव आयोग में हुई एक बैठक में दोनों पक्षों के असली पार्टी होने के दावे को स्वीकार नहीं किए जाने का फैसला लिया गया। 'ओली को पार्टी की सदस्यता से हटाना स्वीकार नहीं' प्रचंड और पीएम ओली दोनों ही धड़ों ने एक याचिका दायर करके आयोग के समक्ष खुद को आधिकारिक पार्टी बताया था। इस बीच चुनाव आयोग के प्रवक्ता राजकुमार श्रेष्ठ ने कहा कि यह फैसला दोनों ही दलों के दावों को देखते हुए लिया गया है। आयोग ने कहा कि वह केपी ओली और प्रचंड के नेतृत्व वाली 441 सदस्यीय सेंट्रल कमिटी को मान्यता देता है। उसने यह भी कहा कि वह ओली और प्रचंड के एकजुटता वाली पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को मान्यता देता है जिसके ये दोनों अध्यक्ष हैं। नेपाली चुनाव आयोग ने कहा कि वह प्रचंड और माधव कुमार नेपाल के धड़े के ओली को पार्टी की सदस्यता से हटाने और माधव कुमार नेपाल को नया पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले को स्वीकार नहीं करेगा। नेपाली चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों ही धड़ों को अब मध्यावधि चुनाव में जाने के लिए एक नई पार्टी के रूप में रजिस्टर कराना होगा। इससे पहले सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाले गुट ने रविवार को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पार्टी की सदस्यता से निष्कासित कर दिया। द हिमालयन टाइम्स की खबर के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व वाले गुट की स्थाई समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया।
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