धरती के वायुमंडल की जिस परत में ओजोन गैस पाई जाती है, वह तेज से सिकुड़ती जा रही है। 1980 के बाद से हर दशक में यह 100 मीटर की दर से कम हो रही है। इसके पीछे ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा को जिम्मेदार बताया गया है। पिछले हफ्ते एन्वायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स जर्नल में छपी स्टडी में आशंका जताई गई है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो साल 2080 तक इसकी मोटाई 1.3 किलोमीटर तक कम हो जाएगी। वैज्ञानिकों को डर है कि इसकी वजह से धरती की कक्षा में घूम रहीं सैटलाइट्स को नुकसान हो सकता है।NASA के गॉडार्ड इंस्टिट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के डायरेक्टर गैविन श्मिट ने कनाडा के नैशनल ऑब्जर्व को 2016 में बताया था कि कार्बनडायऑक्साइड स्ट्रेटोस्फीयर में ठंडी हो जाती है जिससे ये सिकुड़ने लगती है।

धरती के वायुमंडल की जिस परत में ओजोन गैस पाई जाती है, वह तेज से सिकुड़ती जा रही है। 1980 के बाद से हर दशक में यह 100 मीटर की दर से कम हो रही है। इसके पीछे ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा को जिम्मेदार बताया गया है। पिछले हफ्ते एन्वायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स जर्नल में छपी स्टडी में आशंका जताई गई है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो साल 2080 तक इसकी मोटाई 1.3 किलोमीटर तक कम हो जाएगी। वैज्ञानिकों को डर है कि इसकी वजह से धरती की कक्षा में घूम रहीं सैटलाइट्स को नुकसान हो सकता है।
क्यों सिकुड़ रही है?

सैटलाइट डेटा और क्लाइमेट मॉडल्स के आधार पर रिसर्चर्स ने बताया है कि स्ट्रेटोस्फीयर (stratosphere) के नीचे की परत ट्रोपोस्फीयर (troposphere) जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्म हो रही है। धरती के करीब 12 से 50 किमी तक जाने वाली स्ट्रेटोस्फीयर में ही ओजोन गैस पाई जाती है जो हमें सूरज के हानिकारक रेडिएशन से बचाती है। ट्रोपोस्फीयर के गर्म होने से स्ट्रेटोस्फीयर का निचला हिस्सा बाहर की ओर दब रहा है। कार्बनडायऑक्साइड की मात्रा बढ़ने से ये परत सिकुड़ती जा रही है।
सैटलाइट को नुकसान

NASA के गॉडार्ड इंस्टिट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के डायरेक्टर गैविन श्मिट ने कनाडा के नैशनल ऑब्जर्व को 2016 में बताया था कि कार्बनडायऑक्साइड स्ट्रेटोस्फीयर में ठंडी हो जाती है जिससे ये सिकुड़ने लगती है। ब्रिटेन की रीडिंग यूनिवर्सिटी के अटमॉस्फीरिक साइंस के प्रफेसर पॉल विलियम्स ने बताया कि इसकी वजह से धरती की कक्षा में घूम रहीं सैटलाइट्स को नुकसान हो सकता है।
क्या होगा असर?

पॉल का कहना है कि अगर स्ट्रेटोस्फीयर के सिकुड़ने से उसके ऊपर की दूसरी परतें भी नीचे आती हैं, तो निचली कक्षा में घूम रहीं सैटलाइट्स के सामने हवा का कम प्रतिरोध होगा। इससे उनके रास्ते पर असर पड़ सकता है। पॉल का कहना है कि ये परतें इलेक्ट्रिकली चार्ज होती हैं और उनमें बदलाव होने से रेडियो वेव्स के ट्रांसमिशन पर भी असर हो सकता है। जैसे आइओनोस्फीयर में चार्ज्ड पार्टिकल्स होते हैं जो सूरज से आने वाले रेडिएशन के कारण न्यूट्रल गैस ऐटम्स से अलग होते हैं। इससे निकली इलेक्ट्रिक कंडक्टिविटी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें पैदा करती है जिनका इस्तेमाल धरती के इलेक्ट्रिक एनवायरन्मेंट और मौसम को स्टडी करने के लिए किया जाता है।
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