तेहरान ईरान में वर्ष 1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद देश के पहले राष्ट्रपति बने का शनिवार को पेरिस में 88 साल की उम्र में निधन हो गया है। देश के धर्मतंत्र बनने व मौलवियों की बढ़ती ताकत को चुनौती देने के कारण उन्हें महाभियोग का सामना करना पड़ा। सत्ता से हटाए जाने के बाद वह तेहरान छोड़कर चले गए थे। बनीसद्र के परिवार ने एक बयान में कहा कि उनका पेरिस के अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है। ईरानी सरकार पर पकड़ नहीं बना पाए बनीसद्र माना जाता है कि बनीसद्र कभी सरकार पर अपनी पकड़ नहीं बना पाए जिसकी वजह से स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर चली गई। अमेरिका दूतावास बंधक संकट और ईरान का इराक पर हमले के कारण स्थिति बिगड़ती चली गई। यही कारण था कि अयातुल्लाह खमैनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई। ईरान की वास्तविक शक्ति खोमैनी के हाथ में गई वास्तविक शक्तियां ईरान के शीर्ष धार्मिक नेता अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी के हाथों में ही रही और जिसके लिए बनीसद्र ने फ्रांस से निर्वासन में रहते हुए काम किया और क्रांति के बीच तेहरान लौटे। हालांकि, खोमैनी ने 16 महीनों के भीतर उन्हें पदच्युत कर दिया और उन्हें वापस पेरिस भेज दिया जहां पर वह दशकों तक रहें। फ्रांस में निर्वासित जीवन जी रहे थे खोमैनी 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले अयातुल्ला रुहोल्ला खोमैनी तुर्की, इराक और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे। खोमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे। 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी। मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो। तो अमेरिका के कारण हुई थी ईरानी क्रांति? किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक्त में अपदस्थ करने का काम अमेरिका ने पहली बार ईरान में किया था। लेकिन यह आखिरी नहीं था। इसके बाद अमेरिका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया। 1953 में ईरान में अमेरिका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी। इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट खत्म नहीं हुई। (एजेंसियों से इनपुट के साथ)
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