Thursday, 1 July 2021

https://ift.tt/36CAGd7

भूमध्य सागर में ब्रिटेन और रूस के बीच जारी तनाव में अब अमेरिका भी कूद गया है। ब्रिटिश एयरक्राफ्ट कैरियर एचएमएस क्वीन एलिजाबेथ के बिलकुल पास मिसाइल युद्धाभ्यास कर रही रूसी सेना को ओहियो क्लास की यूएसएस अलास्का बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी ने चुनौती दी है। कुछ दिनों पहले ही रूस ने आरोप लगाया था कि ब्रिटेन और अमेरिका के लड़ाकू विमानों ने उसके युद्धपोतों के ऊपर से उड़ान भरी है। यह अमेरिकी पनडुब्बी 21 साल में पहली बार भूमध्य सागर स्थित ब्रिटिश ओवरसीज क्षेत्र में स्थित यूके रॉयल नेवी से बेस का दौरा किया है। अमेरिकी नौसेना ने अपने बयान में बताया है कि उसकी ओहियो श्रेणी की यूएसएस अलास्का बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी ने भूमध्य सागर में ब्रिटिश नौसैनिक अड्डे पर अत्यंत दुर्लभ स्टॉपओवर लिया है। यह ठहराव रसद आपूर्ति के लिए लिया गया है जो पहले से ही निर्धारित थी। लेकिन, विशेषज्ञ इसे रूस से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ दिन पहले ही रूस ने ब्रिटिश नौसेना के एचएमएस डिफेंडर को काला सागर से खदेड़ दिया था।

UK Russia Tensions US: भूमध्य सागर में ब्रिटेन और रूस के बीच जारी तनाव में अब अमेरिका भी कूद गया है। ब्रिटिश एयरक्राफ्ट कैरियर एचएमएस क्वीन एलिजाबेथ के बिलकुल पास मिसाइल युद्धाभ्यास कर रही रूसी सेना को ओहियो क्लास की यूएसएस अलास्का बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी ने चुनौती दी है।


रूस ने ब्रिटिश युद्धपोत को घेरा तो अमेरिका ने 21 साल बाद भेजी महाविनाशक परमाणु पनडुब्बी, होगी जंग?

भूमध्य सागर में ब्रिटेन और रूस के बीच जारी तनाव में अब अमेरिका भी कूद गया है। ब्रिटिश एयरक्राफ्ट कैरियर एचएमएस क्वीन एलिजाबेथ के बिलकुल पास मिसाइल युद्धाभ्यास कर रही रूसी सेना को ओहियो क्लास की यूएसएस अलास्का बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी ने चुनौती दी है। कुछ दिनों पहले ही रूस ने आरोप लगाया था कि ब्रिटेन और अमेरिका के लड़ाकू विमानों ने उसके युद्धपोतों के ऊपर से उड़ान भरी है। यह अमेरिकी पनडुब्बी 21 साल में पहली बार भूमध्य सागर स्थित ब्रिटिश ओवरसीज क्षेत्र में स्थित यूके रॉयल नेवी से बेस का दौरा किया है। अमेरिकी नौसेना ने अपने बयान में बताया है कि उसकी ओहियो श्रेणी की यूएसएस अलास्का बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी ने भूमध्य सागर में ब्रिटिश नौसैनिक अड्डे पर अत्यंत दुर्लभ स्टॉपओवर लिया है। यह ठहराव रसद आपूर्ति के लिए लिया गया है जो पहले से ही निर्धारित थी। लेकिन, विशेषज्ञ इसे रूस से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ दिन पहले ही रूस ने ब्रिटिश नौसेना के एचएमएस डिफेंडर को काला सागर से खदेड़ दिया था।



21 साल में पहली बार जिब्राल्टर पहुंची अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी
21 साल में पहली बार जिब्राल्टर पहुंची अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी

अमेरिकी नौसेना ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की थी कि यूएसएस अलास्का कल जिब्राल्टर में रवाना हुआ था। परमाणु शक्ति संपन्न पनडुब्बियों की यात्रा को लेकर इस ऐलान को अप्रत्याशित तौर पर देखा गया। इससे पहले अमेरिका कभी भी अपनी परमाणु पनडुब्बियों की गतिविधियों के बारे में पहले ही जानकारी नहीं देता है। यू.एस. नेवल फोर्सेज यूरोप-अफ्रीका/यू.एस. सिक्स्थ फ्लीट के प्रवक्ता और यूएस नेवी के लेफ्टिनेंट कमांडर लेनया रोटक्लेन ने द वॉर जोन को बताया कि 21 साल में यह पहला मौका है जब ओहियो क्लास के एसएसबीएन ने 1999 के बाद से जिब्राल्टर के नौसैनिक बेस पर ठहराव लिया है। अमेरिका के पास ओहियो क्लास की 18 पनडुब्बियां हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि कि इन 18 में से कितनों ने जिब्राल्टर की आजतक यात्रा की है। लेफ्टिनेंट कमांडर रोटक्लेन ने कहा कि यूएसएस अलास्का (एसएसबीएन 732) ने 28 जून, 2021 को जिब्राल्टर के बंदरगाह पर रसद के लिए पहले से निर्धारित संक्षिप्त स्टॉप का आयोजन किया। अलास्का पनडुब्बी यूरोप और अफ्रीका में अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के समर्थन में संचालन के लिए अमेरिकी नौसेना के छठे बेड़े का हिस्सा है। यह संक्षिप्त स्टॉप संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम-जिब्राल्टर के बीच सहयोग को मजबूत करता है।



एक साथ 280 ठिकानों पर परमाणु हमला कर सकती है यह पनडुब्बी
एक साथ 280 ठिकानों पर परमाणु हमला कर सकती है यह पनडुब्बी

अमेरिकी नौसेना ने यह नहीं बताया कि यूएसएस अलास्का को किस प्रकार से लॉजिस्टिक की जरूरत थी, जिसके लिए इसे जिब्राल्टर में रुकना पड़ा। इससे पहले अन्य प्रकार की अमेरिकी पनडुब्बियां नियमित रूप से इस रॉयल नेवी बेस पर रुकती रही हैं। बंदरगाह पर पहुंचने पर टगबोट्स ने पनडुब्बी को किनारे पर रोका और उनमें जरूरी सामान को लोड किया। आधुनिक सैन्य पनडुब्बियां जब सतह पर आतीं हैं तो उनकी सुरक्षा को सबसे ज्यादा खतरा होता है। यहां से वे दुश्मन की नजरों से छिप नहीं सकती हैं। अलास्का पनडुब्बी के लिए यह खतरा दोगुना हो जाता है, क्योंकि यह अपने साथ हमेशा फायर करने के लिए तैयार दर्जनों परमाणु मिसाइलों के साथ गश्त करती है। अमेरिकी नौसेना की प्रत्येक ओहियो क्लास की पनडुब्बी में 20 की संख्या में ट्राइडेंट D5 सबमरीन लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात होती हैं। प्रत्येक ट्राइडेंट डी5 मिसाइल 14 की संख्या में स्वतंत्र W76-1 या W88 परमाणु हथियार ले जा सकता है। इनमें से एक W76-1 परमाणु हथियार लगभग 100 किलोटन, जबकि W88 परमाणु हथियार 475 किलोटन की ऊर्जा पैदा कर सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि 20 ट्राइडेंट D5 सबमरीन लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलें 280 ठिकानों पर परमाणु हमला कर सकती हैं।



कई खतरनाक हथियारों से लैस है यूएसएस अलास्का
कई खतरनाक हथियारों से लैस है यूएसएस अलास्का

अमेरिका और रूस के बीच कई हथियार नियंत्रण समझौतों के कारण इन मिसाइलों में से केवल 5 या 6 ही हमेशा तैनात होती हैं। जनवरी 2020 से कुछ ओहियो पनडुब्बियों में तैनात ट्राइडेंट D5s मिसाइलों में कम क्षमता की W76-2 परमाणु विस्फोटक ही लगे हुए हैं। माना जा रहा है कि ट्राइडेंट D5s मिसाइल केवल पांच किलोटन के परमाणु विस्फोट को कर सकती है। अमेरिका के कई रक्षा विशेषज्ञ इसके लिए सरकार की आलोचना करते हैं, वहीं कई ऐसे भी हैं जो इसे रूस के साथ परमाणु बातचीत करने के लिए आवश्यक कदम बताते हैं। जिब्राल्टर में यूएसएस अलास्का का आगमन मात्र एक संयोग नहीं है। अगर अमेरिका इतने प्रचार के साथ अपनी परमाणु पनडुब्बी को किसी विवादित क्षेत्र में भेज रहा है कि तो इसके कई मायने हो सकते हैं।



लंबे समय तक समुद्र में छिपी रह सकती है यूएसएस अलास्का
लंबे समय तक समुद्र में छिपी रह सकती है यूएसएस अलास्का

यूएसएस अलास्का को अगर पनडुब्बी में तैनात नौसैनिकों के लिए खाने की वस्तुएं न लेनी हो तो वह कई महीनों तक पानी के नीचे गायब रह सकता है। इसमें खुद के ऑक्सीजन जेनरेटर्स लगे होते हैं, जो पनडुब्बी में तैनात नौसैनिकों के लिए ऑक्सीजन पैदा करते हैं। इसके अलावा परमाणु रिएक्टर लगे होने के कारण इनके पास ऊर्जा का अखंड भंडार होता है। जबकि परंपरागत पनडुब्बियों में डीजल इलेक्ट्रिक इंजन होता है। उन्हें इसके लिए डीजल लेने और मरम्मत के काम के लिए बार बार ऊपर सतह पर आना होता है। पानी के नीचे अगर कोई पनडुब्बी छिपी हुई तो उसका पता लगाना बहुत ही कठिन काम होता है। लेकिन, अगर वह पनडुब्बी किसी काम से एक बार भी सतह पर दिखाई दे दे तो उसको डिटेक्ट करना और पीछा करना दुश्मन के लिए आसान हो जाता है।



यूएसएस ओहियो भी 154 टॉमहॉक के साथ लगा रहा गश्त
यूएसएस ओहियो भी 154 टॉमहॉक के साथ लगा रहा गश्त

अमेरिका ने अपनी सबसे बड़ी परमाणु पनडुब्बी यूएसएस ओहियो को चीन के नजदीक तैनात किया है। इस पनडुब्बी पर लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें तैनात हैं, जो दुनिया के किसी भी कोने में हमला कर सकती हैं। आकार में बड़ी होने के कारण यूएसएस ओहियो में 154 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें तैनात होती हैं। यह क्षमता अमेरिका के गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर में तैनात मिसाइलों की दोगुनी है। हर एक टॉमहॉक मिसाइल अपने साथ 1000 किलोग्राम तक के हाई एक्सप्लोसिव वॉरहेड को लेकर जाने में सक्षम है। अमेरिकी सेना में 1983 से तैनात यह मिसाइल सीरिया, लीबिया, ईराक और अफगानिस्तान में अपनी ताकत दिखा चुकी है।





from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3dxk0Xi
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

क्‍योटो ताइवान को लेकर चीन के साथ जंग के मंडराते खतरे को देखते हुए अमेरिका और जापान एक गुप्‍त युद्धाभ्‍यास और सैन्‍य अभ्‍यास कर रहे हैं। यह अभ्‍यास ऐसे समय पर हो रहा है कि जब चीन के आक्रामक व्‍यवहार को लेकर पूरे इलाके में चिंता बढ़ी हुई है। अमेरिका और जापान के सैन्‍य अधिकारियों ने ट्रंप प्रशासन के अंतिम साल में चीन के साथ संभावित संघर्ष को लेकर गंभीरतापूर्वक योजना बनानी शुरू कर दी थी। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्‍स ने इस सैन्‍य अभ्‍यास से जुडे़ सूत्रों के हवाले से कहा कि यह सीक्रेट अभ्‍यास दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में चल रहा है। वर्ष 2019 में जापान के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने चीन की ओर से ताइवान और सेनकाकू द्वीप समूह को लेकर बढ़ते खतरे को देखते हुए सैन्‍य प्‍लानिंग को व्‍यापक रूप देने का फैसला किया था। चीनी नौसेना सेनकाकू द्वीप समूह के पास काफी सक्रिय चीन के खिलाफ सैन्‍य तैयारी का यह सिलसिला दोनों देशों में नेतृत्‍व में बदलाव के बाद भी जारी है। अमेरिका और जापान की टेंशन उस समय बढ़ गई जब चीन ने बड़े पैमाने पर अपने फाइटर जेट और बॉम्‍बर को ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटीफ‍िकेशन जोन में भेज दिया। गत 15 जून को चीन के 28 फाइटर जेट ताइवान के क्षेत्र में घुस गए थे। यही नहीं चीनी नौसेना, एयरफोर्स और कोस्‍ट गार्ड भी इन दिनों जापान के सेनकाकू द्वीप समूह के पास काफी सक्रिय हो गए हैं। इस द्वीप पर चीन और ताइवान दावा करते हैं लेकिन इसका प्रशासन जापान के पास है। चीन लगातार जोर देकर कहता रहा है कि वह ताइवान का चीन के साथ एकीकरण चाहता है। चीन ने कहा है कि वह शांतिपूर्ण एकीकरण चाहता है लेकिन उसने ताइवान पर कब्‍जा करने के लिए ताकत के इस्‍तेमाल को खारिज नहीं किया है। एक अमेरिकी विशेषज्ञ रैंडी स्‍चरिवेर कहते हैं कि कई तरीके से चीनी सेना ने अमेरिका और जापान को ताइवान पर नई सोच के लिए साथ ला दिया है। ताइवान को लेकर युद्ध योजना बन रही दरअसल, अमेरिका जापान के साथ मिलकर ज्‍यादा से ज्‍यादा संयुक्‍त सैन्‍य अभ्‍यास करना चाहता रहा है लेकिन तोक्‍यो अब तक इससे परहेज करता रहा है। अब चीन की वजह से यह दुविधा कम हो गई है लेकिन अभी खत्‍म नहीं हुई है। दोनों देशों में जब रक्षा सहयोग बढ़ने लगा तब जापान ने अमेरिका से कहा कि वह ताइवान को लेकर अपने युद्ध की योजना को साझा करे। हालांकि अमेरिका ऐसा करने से परहेज किया। अब दोनों के बीच एकजुट होकर ताइवान को लेकर युद्ध योजना बन रही है।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3hq9fHC
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

क्यूबेक कनाडा के आसामान में बने हीट डोम के कारण गर्मी ने 10000 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में तो पारा 49.44 डिग्री सेल्सियस तक रिकॉर्ड किया गया है। अत्याधिक गर्मी के कारण एक दिन में ही 230 लोगों की मौत हो गई है। ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर जॉन होर्गन ने मौत की पुष्टि करते हुए कहा कि उनके राज्य में तापमान के चरम तक पहुंचने के कारण 230 लोगों की मौत हुई है। 49 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचा तापमान इस रविवार से पहले कनाडा में कभी भी तापमान 113 डिग्री फारेनहाइट यानी 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं गया था। तापमान का यह रिकॉर्ड साल 1937 में बना था। लेकिन इस बार 10 हजार साल में एक बार बनने वाले हीट डोम के कारण तापमान 49 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया। अधिकारियों का कहना है कि अकेले वैंकूवर में गर्मी के कारण 65 लोगों की मौत हुई है। कनाडा मौसम विभाग ने गर्मी को बताया ऐसा कनाडा की मौसम सेवा ने कहा कि इस अत्यधिक गर्मी को शब्दों का वर्णन नहीं कर सकता है। मौसम विभाग ने बताया कि ब्रिटिश कोलंबिया का रिकॉर्ड अब लास वेगास में दर्ज किए गए अबतक के सबसे उच्चतम तापमान से भी अधिक है। यह हीटवेव कनाडा से लेकर अमेरिका तक फैली हुई है। अमेरिका के वाशिंगटन और ओरेगन में भी रिकॉर्ड तापमान का अनुभव किया जा रहा है। क्या है हीट डोम, जिसने मचाई तबाही कनाडा में पिछले 10 हजार साल में पहला मौका है, जब हीट डोम ने गर्मी बढ़ाकर तबाही मचाई है। इसके कारण गर्मी वायुमंडल में अधिक फैलती है और दबाव और हवा के पैटर्न को प्रभावित करती है। गर्म हवा का यह ढेर उच्च दबाव वाले क्षेत्र में फंस जाता है। इससे आसपास की हवा और भी ज्यादा गर्म होती है। यह बाहरी हवा को अंदर नहीं आने देता है और अंदर की हवा को गर्म बनाए रखता है। 10 हजार साल में पहली बार ऐसा हुआ अमेरिकी मीडिया सीबीएस के मौसम विज्ञानी जेफ बेरार्डेली ने कहा कि अगर आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो 10000 साल में हीट डोम जैसी घटनाएं केवल एक बार होती हैं। अगर आप किसी स्थान पर पिछले 10 हजार साल से रह रहे हों तो आप केवल एक बार हीट डोम की गर्मी का अनुभव कर पाएंगे। बर्नाबी रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस के कैप्टन माइक कलांज ने कहा कि उन्हें पिछले 24 घंटे के अंदर लोगों के मौत के 25 फोन आए हैं। आपात स्थिति में ही पुलिस ने सहायता मांगने की अपील की मौसम विभाग ने बताया है कि बुधवार तक ब्रिटिश कोलंबिया, युकोन और उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की लहर कम हो सकती है। हालांकि, प्रेयरी क्षेत्रों में गर्मी के बने रहने की उम्मीद है। वैंकूवर में, पुलिस विभाग ने कहा कि उसने दर्जनों अधिकारियों को फिर से तैनात किया है और जनता से केवल आपात स्थिति के लिए 911 पर कॉल करने के लिए कहा है। गर्मी से संबंधित मौतों ने अस्पतालों के फ्रंट-लाइन संसाधनों को समाप्त कर दिया है, इससे लोगों की सहायता करने में भी दिक्कत आ रही है।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3juZxpQ
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

ब्रातिस्‍लावा लंबे समय से कार से हवा में उड़ने की तमन्‍ना रखने वालों के लिए अच्‍छी खबर है। एक ऐसी कार जो सड़क पर चलने के साथ- साथ हवा में भी उड़ने की क्षमता रखती हो, उसके बारे में सोचना काफी रोमांचक लगता है लेकिन उसे बनाना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। हालांकि अब यह सपना पूरा होने जा रहा है। इसी तरह की एक कार ने अब ऐतिहास‍िक उड़ान भरते हुए एक शहर से दूसरे शहर तक का सफर पूरा किया है। इस कार को एयरकार नामक कंपनी ने बनाया है और इस कार ने गत 28 जून को स्‍लोवाकिया के दो अंतराष्‍ट्रीय हवाई अड्डों नित्रा और ब्रातिस्‍लावा के बीच उड़ान भरी। दोनों एयरपोर्ट के बीच दूरी को पूरा करने में इस फ्लाइंग कार को मात्र 35 मिनट लगे। यही नहीं यह कार मात्र तीन मिनट के अंदर उड़ने वाले कार में बदल जाती है। इस कार में 160 हार्स पावर का बीएमडब्‍ल्‍यू का इंजन लगाया गया है। कार की हवा में 170 किमी प्रतिघंटे रफ्तार एक बार तेल भरने पर यह कार 8200 फुट की ऊंचाई पर करीब 1000 किमी तक उड़ान भर सकती है। इसमें एक फिक्‍स प्रोपेलर और पैराशूट लगा हुआ है। यह कार हवा में 170 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से उड़ सकती है। कंपनी इसकी स्‍पीड को 300 किमी प्रतिघंटे तक बढ़ाने पर विचार कर रही है। इस कार ने अब तक 40 घंटे की उड़ान भरी है। अपनी उड़ान के दौरान कार ने 45 डिग्री पर खुद को मोड़ा। यह कार उड़ने में मात्र दो मिनट और 15 सेकंड लेती है। इतना ही समय इसे कार से प्‍लेन में बदलने में लगता है। इस शानदार सफलता के बाद माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में शहरों के बीच यातायात का नक्‍शा ही बदल जाएगा। वह भी तब जब दुनियाभर के महानगर सड़कों पर भीषण जाम से जूझ रहे हैं। आने वाले समय में सड़कों पर दबाव को कम कर सकती हैं और यात्रा में लगने वाले समय को भी बचा सकती हैं। उबर जैसी कंपनियों ने पहले ही घोषणा कर दी है कि वह उड़ने वाली कार पर काम कर रही हैं। इन कारों का इस्‍तेमाल आने वाले समय में एक शहर से दूसरे शहर के बीच यातायात के लिए किया जाएगा।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3AgufZV
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

पेइचिंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को आज स्थापना के 100 साल पूरे हो गए हैं। इस अवसर पर चीन में बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें पार्टी महासचिव ने भी हिस्सा लिया। पार्टी के इस कार्यक्रम में चीनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया गया। इतना ही नहीं, जिनपिंग ने तो आंख दिखाने वाले देशों को अंजाम भुगतने की धमकी भी दे डाली। पिछले 100 सालों में कम्युनिस्ट पार्टी को कई उतार-चढ़ाव झेलने पड़े। जानिए सीपीसी का कैसा रहा 100 साल का सफर गुरिल्ला लड़ाके के तौर पर हुआ जन्म साल 1917 में सोवियत संघ में लेनिन के नेतृत्व में अक्टूबर समाजवादी क्रांति की जीत के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा पूरे चीन में फैल गई। जिसके बाद चीन के विचारकों को यह लगने लगा की देश को एकीकृत करने के लिए मार्क्सवाद ही सबसे ताकतवर हथियार है। 1919 में चीन में साम्राज्यवाद और सामंतवाद के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया। इसी दौरान वहां मजदूर वर्ग एक बड़ी ताकत बनकर उभरा। 1921 में सीपीसी की पहली कांग्रेस का आयोजन पूरे चीन में मजदूर आंदोलनों को व्यवस्थि ढंग से चलाने और मार्क्सवाद को फैलाने के लिए ने चेन डक्सिउ औक ली डजाओ के साथ मिलकर 1921 में कम्युनिस्ट समूहों की स्थापना की। इसी कारण से चीन में श्रमिक आंदोलन और प्रभावी ढंग से चलने लगा और आगे चलकर यही चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से जाना जाने लगा। जुलाई 1921 में सीपीसी की पहली कांग्रेस का आयोजन भी किया गया। जिसे आधिकारिक रूप से पार्टी का स्थापना वर्ष माना जाता है। 1934 का लॉन्ग मार्च चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में 1934 के लॉन्ग मार्च का भी खास स्थान है। 16 अक्टूबर 1934 से शुरु होकर 20 अक्टूबर 1935 तक चला था। इसमें चांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ठ्रवादी कुमिंगतांग पार्टी की सेना ने कम्युनिस्टों की लाल सेना को 9000 किलोमीटर पीछे ढकेल दिया था। वास्तव में यह एक मार्च नहीं ,बल्कि कई मार्च की एक श्रृंखला थी। जिसमें से जिआंगशी प्रान्त से अक्टूबर 1934 को शुरू हुआ कूच सबसे प्रसिद्ध है। यह मार्च माओत्से तुंग और चाऊ एनलाई के नेतृत्व में किये गए। जिसमें लाल सेना पश्चिमी चीन के दुर्गम क्षेत्रों से गुजरकर पहले पश्चिम की ओर और फिर उत्तर मुड़कर शान्शी प्रान्त पहुंची। यह यात्रा इतनी खतरनाक रही कि जब इसे शुरू किया गया तो कम्युनिस्ट सेना में 1,00,000 साम्यवादी सैनिक थे लेकिन इसके अंत कर इनमें से 20 फीसदी ही जीवित बचे। 1949 में चीन पर एकछत्र कब्जा साल 1937 में चीन पर जब जापान ने आक्रमण कर दिया तब कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी सेना आपस मे मिल गई। लेकिन जापान के हारने के बाद इन दोनों के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। इस दौरान राष्ट्रवादी सेना पर कम्युनिस्ट सेना भारी पड़ी और 1949 में पूरे चीन पर माओत्से तुंग का शासन हो गया। इस हार के बाद चांग काई शेक के नेतृत्व वाली सरकार मुख्य भूमि को छोड़कर एक द्वीप में शरण ली। इसी को आज ताइवान के नाम से जाना जाता है। ताइवान खुद को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ ताइवान भी बताता है। 1966 की सांस्कृतिक क्रांति माओत्से तुंग ने 1966 में चीन में राजनीतिक आंदोलन के रूप में सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की। 16 मई 1966 को शुरू हुई यह क्रांति 10 वर्षों तक चली और इसने चीन के सामाजिक ढांचे में कई बड़े परिवर्तन किए। माओ और उनके समर्थकों ने पुराने रिवाज, तौर-तरीके, संस्कृति और पुरानी सोच को खत्म करना शुरू किया। इस क्रांति ने चीन के सामाजिक ढाचे को काफी नुकसान पहुंचाया। इस दौरान रेड गार्ड ने इतने अत्याचार किए कि दो साल के अंदर कई लाख लोगों की मौत हो गई। नए माओ बने शी जिनपिंग 68 साल के शी जिनपिंग पिछले नौ साल से कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और चीन के राष्ट्रपति बने हुए हैं। तीन साल पहले उन्होंने राष्ट्रपति पद पर बने रहने की सीमा को खत्म कर दिया था। ऐसे में साल 2028 या 2033 तक उनके पार्टी महासचिव का पद छोड़ने की उम्मीद नहीं है। चीन में शी जिनपिंग को माओ और देंग शियाओपिंग के बाद तीसरा सबसे बड़ा नेता माना जाता है। वहीं, उनके आलोचकों का कहना है कि शी जिनपिंग को यह पद उनके करिश्माई व्यक्तित्व और काम के बदले नहीं बल्कि खानदानी पहुंच के जरिए मिला है। शी जिनपिंग के पिता माओ और देंग शियाओपिंग के कार्यकाल में पार्टी में काफी ऊंचे पद पर कार्यरत थे। चीन को आर्थिक महाशक्ति के रूप में बदलने के लिए जरूरी सभी नीतियों को उनके पिता ने ही बनाया था। जिसके कारण उनके पिता को चीनी आर्थिक कार्यक्रम का वास्तुकार माना जाता है।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3w6fwxj
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

पेइचिंग चीन की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के 100 साल पूरे होने पर प्रोपेगैंडा फैलाने में लगे चीन के सरकारी टीवी चैनल सीजीटीएन को बुधवार को शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा। सीजीटीएन ने भारत के स्‍वदेशी तेजस लड़ाकू विमान के वीडियो को चोरी करके उसे अपने फाइटर जेट J-10 की ताकत के रूप में दिखा दिया। बाद में जब लोगों ने सोशल मीडिया पर उसकी पोल खोल दी तो उसे अपना वीडियो ट्विटर पर डिलीट करना पड़ा। दरअसल, चीन के सरकारी टीवी ने अपने एयरफोर्स के पायलट और अपने फाइटर जेट की ताकत का प्रोपेगैंडा करने के लिए वीडियो बनाया। इस वीडियो में उसने लड़ाकू विमान को बम गिराते हुए दिखाया। यही नहीं विमान के भी कई फुटेज को भी दिखाए गए। इस फुटेज में जिस घातक बम को गिराते हुए दिखाया गया वह फुटेज दरअसल भारत के तेजस फाइटर जेट का था। चीन के तेजस के फुटेज चोरी को सोशल मीडिया पर लोगों ने पकड़ा तेजस से बम गिराने का यह परीक्षण वर्ष 2013 में हुआ था। इस दौरान तेजस ने लेजर गाइडेड बम गिराने और हवा से हवा में मिसाइलों को दागने का शानदार प्रदर्शन किया था। चीन के तेजस का फुटेज चोरी करके शेयर करने के बाद ट्विटर पर लोगों ने उसकी चोरी पकड़ ली। इसके बाद उन्‍होंने सीजीटीएन को ट्रोल करना शुरू कर दिया। सीजीटीएन ने चोरी पकड़े जाने के बाद अपने वीडियो को ट्विटर से डिलीट कर दिया। देखें चीन का वीडियो हालांकि अभी चीन का यह वीडियो यूट्यूब पर मौजूद है। इसमें मौजूद‍ क्लिप को लोग तेजस के वीडियो क्लिप से जोड़कर चीन की चोरी को दुनिया के सामने ला रहे हैं। इस घटना के बाद अब सीजीटीएन को भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि जिस तरह से चीन दुनिया से हथियारों के डिजाइन की चोरी करके हथियार बना रहा है, उसी तरह से अब फुटेज की भी चोरी करने लगा है। देखें तेजस और चीनी वीडियो की तुलना उधर, चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की स्थापना के आज 100 साल पूरे हो गए हैं। 1 जुलाई 1921 को चीनी तानाशाह माओत्से तुंग ने शंघाई में अपने कुछ कम्युनिस्ट दोस्तों के साथ मिलकर इस पार्टी की स्थापना की थी। इस अवसर पर चीन की राजधानी पेइचिंग के थियानमेन चौक पर भव्य सैन्य परेड का आयोजन किया गया। स्थापना दिवस पर चीनी वायु सेना के 15 स्टील्थ जे-20 लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरकर हवाई करतब दिखाए। यह चीन का सबसे उन्नत लड़ाकू विमान है। चीन ने हाल में ही इस लड़ाकू विमान के मॉस प्रॉडक्शन को शुरू किया है। जे-20 लड़ाकू विमानों ने विक्ट्री शेप में उड़ान भरी। चीन ने किसी भी एयर शो में एकसाथ इतनी बड़ी संख्या में जे-20 लड़ाकू विमानों को शामिल नहीं किया है।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3dwL3SA
via IFTTT

Wednesday, 30 June 2021

https://ift.tt/36CAGd7

पेइचिंग दुनिया पर कब्जे का ख्वाब देख रहा चीन इन दिनों तेजी से अपनी मिसाइल क्षमता बढ़ा रहा है। हाल में ली गई सैटेलाइट इमेज से पता चला है कि चीन उत्तर-पश्चिमी शहर युमेन के पास एक रेगिस्तान में इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए 100 से अधिक नए साइलो का निर्माण कर रहा है। साइलो स्टोरेज कंटेनर होते हैं, जिनके अंदर लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें रखी जाती हैं। क्या होती हैं इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज काफी ज्यादा होती हैं। ये एक महाद्वीप से उड़कर दूसरे महाद्वीप तक हमला करने में सक्षम होती हैं। इनमें बैलिस्टिक मिसाइलें अपनी लॉन्च साइट से उड़कर अंतरिक्ष के रास्ते सफर करते हुए लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेद सकती हैं। ये मिसाइलें परंपरागत और परमाणु हथियार के साथ मार कर सकती हैं। चीन के पास डीएफ-5 और डीएफ-41 जैसी घातक मिसाइलें है, जो अमेरिका तक मार करने में सक्षम हैं। अमेरिका तक मार करने में सक्षम हैं मिसाइलें चीन की इन तैयारियों से यह अंदेशा जताया जा रहा है कि वह आने वाले दिनों में अपनी मारक क्षमता को बढ़ाने और दुश्मनों पर हावी होने के लिए मिसाइलों को मुख्य हथियार बनाएगा। चीन के पास कई ऐसी घातक मिसाइलें हैं जिनका तोड़ अमेरिका के पास भी नहीं है। अमेरिका के एक शीर्ष जनरल ने खुद कबूला है कि उनके पास अभी भी पर्याप्त संख्या में एयर डिफेंस मौजूद नहीं हैं जो चीनी मिसाइलों को हवा में मार गिराएं। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने चीन की खोली पोल द वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, कैलिफोर्निया में जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज के शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर बताया है कि चीन के गांसु प्रांत में सैकड़ों वर्ग मील में फैले रेगिस्तान में कई साइट पर इन साइलोज को बनाने का काम चल रहा है। शोधकर्ताओं को 119 ऐसे निर्माण स्थलों का पता चला है, जहां चीन अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों को लॉन्च करने के लिए नई सुविधाओं को बना रहा है। परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा चीन अगर 100 से अधिक का निर्माण पूरा हो जाता है तो इससे चीन की परमाणु क्षमता में भी काफी वृद्धि होगी। माना जाता है कि चीन के पास 250 से लेकर 350 की संख्या में परमाणु हथियारों का जखीरा है। ऐसे में चीन इन साइलोज में रखने के लिए और मिसाइलों का निर्माण जरूर करेगा। चीन पहले भी डिकॉय साइलो को तैनात कर चुका है। अमेरिका ने शुरू किया था साइलो का निर्माण शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका ने रूस के रणनीतिकारों से अपनी मिसाइलों को छिपाने के लिए साइलो का निर्माण शुरू किया था। इससे रूसी सैन्य रणनीतिकारों को यह पता नहीं चल पाता था कि अमेरिका के कौन से मिसाइल बेस पर कितनी परमाणु मिसाइलें तैनात हैं। ऐसे में वह हमला करने का जोखिम नहीं उठाते थे। जवाबी कार्रवाई के लिए साइलो बना रहा चीन चीन के परमाणु शस्त्रागार के विशेषज्ञ और इस टीम के शोधकर्ता जेफरी लुईस ने कहा कि चीन भी अमेरिका की ही राह पर चलता दिखाई दे रहा है। इसका निर्माण चीन की परमाणु हमले की जवाबी का कार्रवाई को मजबूत करने के लिए भी की गई है। दरअसल, हर देश परमाणु डेटरेंस के लिए अपने हथियारों को अलग-अलग तैनात रखता है। अगर कोई देश परमाणु हमला करता है तो इन ठिकानों पर तैनात मिसाइलें जवाबी कार्रवाई के लिए फायर की जा सकती हैं। चीन के पास 145 से ज्यादा मिसाइल साइलो मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज के सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज में ईस्ट एशिया नॉनप्रोलिफरेशन प्रोग्राम के निदेशक लुईस ने कहा कि अगर चीन भर में अन्य साइटों पर निर्माणाधीन साइलो को गिनती में जोड़ा जाए, तो इनकी कुल संख्या 145 तक पहुंच जाती है। हम मानते हैं कि चीन अपने परमाणु बलों का विस्तार एक निवारक क्षमता बनाए रखने के लिए कर रहा है जो अमेरिकी मिसाइल डिफेंस को मात देने के लिए पर्याप्त संख्या में मौजूद है।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3dzk7Sa
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

रियाद सऊदी अरब के नेतृत्‍व में गठबंधन सेना ने यमन की राजधानी सना में हूती विद्रोहियों के एक शिविर को हवाई हमला करके तबाह कर दिया है। सऊदी...