टोक्यो जापान अगले दो साल में परमाणु संयंत्र से रोडियोधर्मी पानी की बड़ी मात्रा को अगले दो वर्षों में प्रशांत महासागर में छोड़ना शुरू करेगा। इस कदम का स्थानीय मछुआरों और निवासियों ने कड़ा विरोध किया है। चीन, फिलीपींस और दक्षिण कोरिया ने भी जापान के इस फैसला पर निराशा जताई है। लंबे समय से इस फैसले की अटकलें लगाई जा रही थी लेकिन सुरक्षा चिंताओं एवं विरोध के कारण इसमें देरी हुई। जापानी कैबिनेट ने किया पानी छोड़ने का फैसला समुद्र में दूषित पानी को छोड़े जाने का फैसला जापानी कैबिनेट मंत्रियों की बैठक में लिया गया। मंत्रियों ने पानी को महासागर में छोड़े जाने को ही बेहतर विकल्प बताया है। प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने कहा कि महासागर में पानी छोड़ा जाना सबसे व्यावहारिक विकल्प है। उन्होंने यह भी कहा कि फुकुशिमा संयंत्र को बंद करने के लिए पानी का निस्तारण अपरिहार्य है, जिसमें कई दशक का वक्त लगने का अनुमान है। कैसे संक्रमित हुआ था फुकुशिमा का पानी साल 2011 में जापान में आए भीषण भूकंप के कारण फुकुशिमा के न्यूक्लियर पावर प्लांट को भारी नुकसान पहुंचा था। इसी के बाद इस प्लांट का कूलिंग वाटर रेडियोएक्टिव पदार्थों के मिलने से दूषित हो गया था। तबसे ही जापानी सरकार ने इस पानी को फुकुशिमा दाइची संयंत्र में टंकियों में स्टोर करके रखा हुआ है। अब इस प्लांट का संचालन करने वाली तोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (तेपको) ने कहा कि अगले साल के अंत तक इसकी भंडारण क्षमता पूर्ण हो जाएगी। समुद्री जीवों पर प्रभाव पड़ने की आशंका तोक्यो इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन और सरकार के अधिकारियों ने कहा कि ट्रिटियम को पानी से अलग नहीं किया जा सकता है जो कम मात्रा में हानिकारक नहीं होता है लेकिन अन्य सभी चयनित रेडियोन्यूक्लाइड्स का स्तर इतना कम किया जा सकता है कि वे पानी में छोड़ने लायक बन जाएं। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि पानी की इतनी अधिक मात्रा से कम खुराक के संपर्क में आने से समुद्री जीवन पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है।
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