Wednesday, 1 September 2021

https://ift.tt/36CAGd7

पेइचिंग विस्तारवादी चीन अब अंतरिक्ष में कब्जा करने की कोशिश कर रहा है। पृथ्वी की कक्षा में चीन कई किलोमीटर बड़ा विशालकाय 'मेगास्ट्रक्चर' बनाने की तैयारी कर रहा है। इसमें सोलर पावर प्लांट, टूरिस्ट कॉम्प्लेक्स, गैस स्टेशन से लेकर एस्टेरॉइड खनन की भी सुविधा उपलब्ध होगी। National Natural Science Foundation of China ने पांच साल के प्लान की घोषणा करते हुए शोधकर्ताओं को टेक्नोलॉजी और टेक्निक विकसित करने का निर्देश दिया है। 2035 तक स्पेस से बिजली लेगा चीनइस स्ट्रक्चर के निर्माण में हल्के वजन वाली चीजों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि इन्हें मौजूदा रॉकेट से कक्षा में पहुंचाया जा सके। वैज्ञानिकों को कक्षा के भीतर चीजों को स्थापित और कंट्रोल करने के लिए भी तकनीक की जरूरत होगी। चीन की सरकार ने कहा है कि स्पेस में मेगाप्रोजेक्ट्स की तत्काल जरूरत है जिसके लिए विशालकाय अंतरिक्ष की आवश्यकता होगी ताकि वे कक्षा में स्थापित किए जा सकें। यह अपने आप में इस तरह की पहली परियोजना है जिस पर लगभग एक मील चौड़ा सौर ऊर्जा स्टेशन होगा जो 2035 तक चीन के ग्रिड में बिजली सप्लाई कर सकेगा। बौना हो जाएगा आईएसएसदूसरे प्रोजेक्ट्स में ऐसे कई बड़े ऑर्बिटल प्लेटफॉर्म शामिल होंगे जो कई मील स्पेस को कवर कर सकेंगे। इनके सामने अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन बौना दिखेगा, जो सिर्फ करीब 350 फीट तक चौड़ा है। इस मेगास्ट्रक्चर में कई स्पेस स्टेशन शामिल होंगे जो कक्षा में अलग-अलग जगह मौजूद होंगे। चीन पहले ही अंतरिक्ष में अपना खुद का स्पेस स्टेशन Tiangong स्थापित कर चुका है। इसकी योजना अंतरिक्ष में नए रिसर्च मॉड्यूल और टेलीस्कोप भेजकर अपने आकार को बढ़ाने की है। नासा को चुनौती देना चाहता है चीनमेगास्ट्रक्चर को लेकर NSFC ने कोई खास जानकारी नहीं दी है। नई जानकारी सिर्फ रिसर्च के लिए दिए गए निर्देशों को लेकर है। चीन अपने स्पेस स्टेशन के जरिए अमेरिका के नासा को चुनौती देना चाहता है। दरअसल, नासा कई अन्य यूरोपीय देशों के साथ मिलकर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को ऑपरेट कर रहा है। फिलहाल इस स्पेस स्टेशन पर सात अंतरिक्ष यात्री मौजूद हैं।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3kHRwNp
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

यंगून लद्दाख में आंखें दिखा रहे चीन ने अपनी स्ट्र्रिंग ऑफ पर्ल नीति के तहत भारत की चौतरफा घेरेबंदी तेज कर दी है। इसी कड़ी में चीन ने पहली बार भारत का प्रभाव क्षेत्र कहे जाने वाले हिंद महासागर तक अपनी पहली ट्रेन दौड़ा दी है जो सड़क मार्ग से जुड़ी है। नई नवेली रेलवे लाइन के जरिए सामान लेकर यह ट्रेन म्‍यांमार सीमा से पश्चिमी चीन के चेंगदू व्‍यवसायिक हब तक रवाना हुई है। इस रोड-रेललाइन की मदद से चीन की अब सीधी पहुंच बंगाल की खाड़ी तक हो गई है। चीन की सरकारी न्‍यूज सर्विस के मुताबिक प्रयोग के तौर पर सामान को चाइना-म्‍यांमार न्‍यू पैसेज के जरिए 27 अगस्‍त को चेंगदू रेल पोर्ट तक लाया गया है। इस ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर में समुद्री-रोड रेल लिंक शामिल है। सिंगापुर से चीन का सामान अंडमान सागर से होते हुए मालवाहक जहाज के जरिए म्‍यांमार के यंगून बंदरगाह तक पहुंचा था। इसके बाद सामान को सड़क के जरिए म्‍यांमार-चीन सीमा पर यूनान प्रांत के लिकांग तक पहुंचाया गया। दक्षिणी-पश्चिमी चीन को कनेक्‍ट करने का सबसे आसान रास्‍ता इसके बाद सामान को लिकांग से रेलवे के जरिए चेंगदू तक ले जाया गया। इस तरह से चीन अब सिंगापुर से म्‍यांमार के रास्‍ते भी जुड़ गया है। चीनी रिपोर्ट में कहा गया है कि यह हिंद महासागर से दक्षिणी-पश्चिमी चीन को कनेक्‍ट करने का सबसे आसान रास्‍ता है। चीन ने कहा कि इस रास्‍ते के इस्‍तेमाल से एक तरफ यात्रा में 20 से 22 दिन कम लग रहे हैं। चीन की म्‍यांमार के अशांत रखाइन राज्‍य में क्‍याउकफयू में एक और बंदरगाह बनाने की योजना है। यही नहीं चीन इस बंदरगाह तक यूनान से सीधी रेलवे लाइन बनाना चाहता है लेकिन म्‍यांमार में हिंसा के कारण चीन की इस परियोजना में देरी हो रही है। चीन अभी पाकिस्‍तान के ग्‍वादर बंदरगाह के जरिए हिंद महासागर से जुड़ने पर काम कर रहा है। इससे वह मलक्‍का स्‍ट्रेट में अपने दुश्‍मनों के घेरे जाने के खतरे से बच जाएगा। ग्‍वादर पोर्ट को सीपीईसी के तहत बनाया जा रहा है। हालां‍कि अगर चीन चेंगदू के लिए म्‍यांमार के रास्‍ते व्‍यापार करता है तो उसका खर्चा ग्‍वादर के मुकाबले कम आएगा। चीन की बंगाल के खाड़ी तक सीधी पहुंच भारत के लिए बड़ा खतरा म्‍यांमार की सीमा से चीन के चेंगदू शहर तक ट्रेन के पहुंचने में मात्र 3 दिन का समय लगता है। म्‍यांमार की इरावटी न्‍यूज वेबसाइट के मुताबिक यह पश्चिमी चीन को हिंद महासागर से जोड़ने का पहला रास्‍ता है। चीन की रेलवे लाइन अभी म्‍यांमार की सीमा तक आकर खत्‍म हो जाती है। अब इसे चीन बंदरगाह तक बढ़ाना चाहता है। चीन म्‍यांमार के सीमाई कस्‍बे चिन श्‍वे हाव को बेल्‍ट एंड रोड परियोजना के जरिए 'बॉर्डर इकनॉमिक जोन' के रूप में बदलना चाहता है। विश्‍लेषकों के मुताबिक चीन की बंगाल के खाड़ी तक सीधी पहुंच भारत के लिए बड़ा खतरा है। चीन जिस रास्‍ते से दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्‍यापार करना चाहता है, उसी रास्‍ते में अंडमान निकोबार द्वीप समूह भी आते हैं। चीन के जहाज आगे चलकर बड़े पैमाने में बंगाल की खाड़ी से गुजरेंगे। इससे वे आसानी से भारतीय द्वीपों पर नजर रख सकते हैं। यही नहीं चीन की बढ़ती पहुंच से पूर्वोत्‍तर भारत में भी संकट बढ़ सकता है जहां विद्रोही अक्‍सर हमले करते रहते हैं।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3kEPqOl
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

काबुल अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के लौटने के बाद तालिबान ने हवा में धुआंधार गोलीबारी कर जीत का जश्न मनाया। खबरों की मानें तो अब समूह का पूरा ध्यान नई सरकार के गठन पर है जिसके लिए लगातार बैठकें और बातचीत की जा रही है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान का भारत और कश्मीर के प्रति क्या रुख होगा? यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि तालिबान और पाकिस्तान के बीच करीबी संबंध हैं और पाकिस्तान का कश्मीर के प्रति रवैया जगजाहिर है। कश्मीर में हस्तक्षेप नीति के खिलाफतालिबानी नेता अनस हक्कानी ने न्यूज 18 से बात करते हुए कश्मीर और भारत के प्रति तालिबान के रुख को स्पष्ट किया है। हक्कानी ने कहा कि कश्मीर हमारे अधिकार क्षेत्र का हिस्सा नहीं है और इस मामले में दखल देना नीति के खिलाफ है। हम अपनी नीति के खिलाफ कैसे जा सकते हैं? 'स्पष्ट है कि हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे।' अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों को लेकर हक्कानी ने कहा, 'मैं विश्वास दिलाना चाहता हूं कि अफगानिस्तान में सभी सुरक्षित हैं।' भारत के साथ अच्छे संबंधों के लिए तैयारभारत के साथ संबंधों के सवाल पर हक्कानी ने कहा कि हम भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि कोई हमारे बारे में गलत सोचे। भारत ने 20 साल तक हमारे दुश्मन की मदद की लेकिन हम सबकुछ भूलने के लिए और संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। अफगानिस्तान में अधूरे पड़े भारतीय प्रोजेक्ट्स को लेकर तालिबानी नेता ने कहा कि हम आने वाले दिनों में सभी नीतियों को स्पष्ट करेंगे। हम अफगानिस्तान के लोगों के लिए मदद चाहते हैं। हम भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व का समर्थन चाहते हैं। हक्कानी नेटवर्क को मिल सकती है जगहकाबुल गुरुद्वारे पर 2020 में हुए हमले के लिए अमेरिका द्वारा हक्कानी नेटवर्क पर लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए तालिबानी नेता ने कहा कि यह सिर्फ दुश्मन और मीडिया की ओर से फैलाया गया प्रोपेगेंडा है। यह आरोप बिल्कुल गलत और झूठे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार में हक्कानी नेताओं को भी अहम भूमिका मिल सकती है। बीते दिनों आईं तस्वीरों में कई बार तालिबानी और वरिष्ठ हक्कानी नेताओं को एक साथ देखा गया था। हक्कानी नेटवर्क के वरिष्ठ नेता काबुल में हैं और काबुल एयरपोर्ट की सुरक्षा हक्कानी नेटवर्क के हाथों में हैं।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3mKY5l0
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

काबुल तालिबान आतंकियों ने एक बार फिर से विद्रोहियों के गढ़ पंजशीर घाटी पर भीषण हमला बोला है। बताया जा रहा है कि पंजशीर घाटी के अंतर्गत आने वाले परवान प्रांत के जबल सराज जिले में तालिबानी आतंकियों ने ये हमले शुरू किए हैं। यह ताजा हमला मंगलवार रात को शुरू हुआ है और अभी भी जारी है। खबरों के मुताबिक इस हमले में दोनों ही पक्षों के कई लोग हताहत हुए हैं। अफगान मीडिया के अनुसार बघलान प्रांत के अंदराब जिलो में भी संघर्ष की खबरें आ रही हैं। तालिबान ने इस इलाके में इंटरनेट को बंद कर दिया है जिससे मरने वालों की संख्‍या की पुष्टि नहीं हो पा रही है। तालिबानी आतंकी किसी भी तरह से पंजशीर घाटी में घुसना चाहते हैं ताकि अहमद मसूद के किले पर फतह हासिल किया जा सके लेकिन उन्‍हें जोरदार पलटवार का सामना करना पड़ रहा है। नॉर्दन एलायंस के नेता अहमद मसूद को धमकी दी तालिबान ने गुलबहार इलाके में रास्‍ता भी रोक दिया है। इससे पहले अफगानिस्‍तान में विद्रोहियों के गढ़ पंजशीर घाटी को कई दिनों से घेरकर बैठे तालिबानी आतंकियों ने लगातार हार मिलने के बाद नॉर्दन एलायंस के नेता अहमद मसूद को धमकी दे डाली थी। तालिबान ने कहा है कि विद्रोहियों को अपने खून से इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। पंजशीर घाटी ही अब एकमात्र इलाका है जहां पर अभी तक तालिबान का कब्‍जा नहीं हो पाया है। पंजशीर घाटी में अहमद मसूद के सैनिकों तालिबान को धूल चटाने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। यही नहीं इन लड़ाकुओं को ट्रेनिंग का काम लगातार जारी है। अमेरिकी सेनाओं के वापस जाने के बाद तालिबान ने अपने आक्रामक अभियान को तेज कर दिया है। पंजशीर घाटी अफगानिस्‍तान की राजधानी काबुल से 150 किमी दूर है और यहां पर एक लाख लोग रहते हैं। पंजशीर के नेता और अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद ने कहा है, 'मैं पंजशीर की घाटी से आज लिख रहा हूं और अपने पिता के नक्‍शे कदम पर चलने को तैयार हूं। मेरे साथ मुजाहिद्दीन लड़ाके हैं जो एक बार फिर से तालिबान के साथ संघर्ष के लिए तैयार हैं।'


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3DKdGaH
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

वॉशिंगटन अफगानिस्‍तान के काबुल एयरपोर्ट को छोड़ने के साथ ही सुपर पावर अमेरिका की एक और शर्मनाक हार इतिहास के पन्‍नों में दर्ज हो गई है। वियतनाम, पश्चिम एशिया और अब अफगानिस्‍तान में मुट्ठीभर गुरिल्‍ला छापामारों ने परमाणु बम और महाविनाशक फाइटर जेट से लैस अमेरिकी सेना को घुटने पर झुकने के लिए मजबूर कर दिया। अफगानिस्‍तान में अमेरिका के आधी रात भागने को हार इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अमेरिकी सेना के लौटने के बाद अफगानिस्तान में स्थिति ठीक 2001 से पहले वाली ही है। दो ट्रिल्‍यन डॉलर खर्च और एक से बढ़कर एक हथियारों के इस्‍तेमाल के बाद भी अमेरिका अफगानिस्‍तान की जमीनी स्थिति को कुछ भी बदलने में असफल रहा। अमेरिका तालिबान और अपने सबसे बड़े दुश्‍मन अलकायदा के अस्तित्‍व को मिटा नहीं पाया। आइए समझते हैं कि आखिरकार क्‍यों गुरिल्‍ला युद्ध में 'सुपरपावर' अमेरिका अपनी हर लड़ाई क्यों हार जाता है.... वियतनाम का युद्ध करीब 20 साल तक चला। 1956 से 1975 तक चले इस युद्ध में अमेरिकी की सेना 1965 में उतरी और देश को कम्युनिस्ट राष्ट्र बनने से बचाने के लिए एक भीषण लड़ाई शुरू हुई। देखते ही देखते युद्ध अपने चरम पर पहुंच गया। यह साल था 1969 जब अमेरिका ने 5 लाख सैनिकों का भारी भरकम सैन्यबल जंग के मैदान पर उतार दिया लेकिन अगले चार सालों में चीजें तेजी से बदलने लगीं। वियतनाम की सेना ने गुरिल्‍ला युद्ध की रणनीति अपनाई और अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब दिया। अमेरिकी सैनिकों की लाशें जब घर लौटने लगीं तो अमेरिका की सरकार अपने ही लोगों और विपक्ष की आलोचना का शिकार होने लगी। दबाव बढ़ता गया और 1973 में बिनी किसी अंजाम तक पहुंचे अमेरिका ने अपनी सेना वापस बुला ली। लड़ाकुओं की सेना अमेरिकी फौज के आगे स्कूली परेड जितनी भी नहीं वर्ष 2021 में भी इतिहास ने अपने आप को दोहराया। इस बार भी वही अमेरिका था और वही अमेरिकी सेना लेकिन इस बार नक्शे पर था अफगानिस्तान और फैसला लेना था जो बाइडन को। 'सुपरपावर' कहा जाने वाला अमेरिका गुरिल्‍ला युद्ध के मैदान में बैकफुट पर नजर आता है। इसका एक उदाहरण इराक भी है। पश्चिम एशिया के साथ-साथ समूचे विश्व के लिए खतरा बन चुके खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट का इराक के कई हिस्सों पर कब्जा है। हालांकि इन लड़ाकुओं की सेना अमेरिकी फौज के आगे किसी स्कूली परेड जितनी भी नहीं होगी। इसके बावजूद अमेरिकी सेना वहां संघर्ष कर रही है। इस्लामिक स्टेट के पास न अमेरिकी जैसी तकनीक है, न सैन्यबल और न ही पैसा इसके बावजूद पिछले जून में ही आतंकियों के अमेरिका के दो ड्रोन मार गिराए थे। इराक में अमेरिकी सेना की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। हालांकि गनीमत है कि अमेरिकी सैनिक अभी भी वहां मौजूद हैं। अमेरिकी हार को छिपाने के लिए कुछ लोग ओसामा बिन लादेन की हत्या का तर्क दे रहे हैं। इतिहास में सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी के अंत को भी अमेरिका की जीत के रूप में दिखाया जाता है लेकिन हर बार यह तथ्य सामने आकर खड़ा हो जाता है कि अफगानिस्तान, इराक जैसे कई देशों में आतंकवाद और अमेरिकी सेना एक साथ आगे बढ़े थे। रिपोर्ट्स बताती हैं कि1945 के बाद अमेरिका कोरिया, वियतनाम, खाड़ी, इराक और अफगानिस्तान में बड़े युद्ध लड़ चुका है। इनमें से चार लड़ाइयों में अमेरिका की हार हुई है। स्थानीय लड़ाके सैन्य ताकत में भले कमजोर लेकिन अधिक प्रतिबद्ध अफगानिस्तान में अमेरिकी प्रशासन के लिए कई साल काम कर चुके 'द अमेरिकन वार इन अफ़ग़ानिस्तान-ए हिस्ट्री' के लेखक कार्टर मलकासियन आधुनिक जंगों में अमेरिका की हार पर प्रकाश डालते हैं। वह कहते हैं कि 1945 के बाद युद्धों में अमेरिका का मुकाबला ऐसे स्थानीय लड़ाकों से हुआ जो सैन्य ताकत में भले कमजोर थे लेकिन लड़ाई के प्रति अधिक प्रतिबद्ध थे। काबुल से जिस तरह अमेरिकी सेना 'भागी' है, उसने बाइडन और भविष्य के राष्ट्रपतियों के लिए एक शर्मनाक दस्तावेज तैयार कर दिया है जो हमेशा दुनिया के नक्शे पर अमेरिका के आगे चस्पा रहेगा। अमेरिका अपनी लड़ाइयां आखिर क्यों हार जाता है? बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञ बताते हैं कि अमेरिकी सैनिक ऐसी जगहों पर लड़ रहे थे जो उनके लिए बिल्कुल नई थीं। एक तरफ सेना स्थानीय कल्चर और भाषा से पूरी तरह अनजान थी, वहीं 'दुश्मन' को न सिर्फ क्षेत्र की जानकारी थी बल्कि उसके साथ लोकल सपोर्ट भी था। तालिबान समेत कई बार अमेरिका का दुश्मन ऐसी गुरिल्ला सेना थी जो न मरने से डरती थी और न मारने से कतराती थी। धार्मिक कट्टरता ने अमेरिका के दुश्मन को और खतरनाक बना दिया। लिहाजा अमेरिकी सैनिकों मैदान छोड़कर भागना पड़ा। 'तालिबानी जंग के मैदान में मरने और मारने के मकसद से आते थे' रिपोर्ट में विशेषज्ञ ने कहा कि तालिबानी जंग के मैदान में मरने और मारने के मकसद से आते थे। वहीं अमेरिकी या किसी भी सरकारी सैनिक की प्राथमिकता अपनी और अपने साथियों की जान बचाना थी। प्रतिबद्धता और कट्टरपंथ भी 'दुश्मन' का हथियार बना क्योंकि तालिबान अपने देश के लिए लड़ रहा था लेकिन अमेरिकी सैनिक के हाथ में हथियार किसकी रक्षा के लिए थे? यह सवाल उन कारणों में से है जो अमेरिका की हार के लिए जिम्मेदार हैं। इन हारों ने न सिर्फ इतिहास बदले बल्कि ताइवान और भारत जैसे देशों को अमेरिकी सहयोग पर संदेह करने के कारण भी दिए हैं।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3t7DqZp
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

साओ पाउलोसांप का जहर कई मामलों में इंसानों के लिए जानलेवा साबित होता है लेकिन ब्राजील में यह जहर एक बंदर के लिए जीवनरक्षक पाया गया है। ब्राजील के शोधकर्ताओं ने पाया कि एक प्रकार के सांप के जहर के एक अणु ने बंदर की कोशिकाओं में कोरोना वायरस को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसे कोरोना वायरस का इलाज करने के लिए 'दवा' की तरफ एक संभावित कदम के रूप में देखा जा रहा है। जहर का एक अणु बना जीवनरक्षकसाइंस पत्रिका Molecules में छपी एक स्टडी के मुताबिक Jararacussu Pit के जहर के एक अणु ने बंदर की कोशिकाओं में कोरोना वायरस को आगे बढ़ने से रोक दिया जो 75 फीसदी गुना तेजी से फैल रहा था। साओ पाउलो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और अध्ययन के लेखक राफेल गुइडो ने कहा कि सांप के जहर का यह घटक वायरस के एक बेहद महत्वपूर्ण प्रोटीन को रोकने में सक्षम पाया गया। सांप का जहर नहीं है दवासाओ पाउलो में Butantan Institute's biological collection चलाने वाले हरपेटोलॉजिस्ट Giuseppe Puorto ने कहा कि हम उन लोगों को लेकर चिंतित है जो ब्राजील में Jararacussu का शिकार करने के लिए प्रेरित होंगे, यह सोचकर कि वे दुनिया को बचाने जा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'सांप का जहर कोरोना वायरस को ठीक नहीं कर सकता है।' Jararacussu ब्राजील के सबसे लंबे सापों में से एक है, जिसकी लंबाई 6 फीट तक होती है। इंसानों पर प्रयोग की तैयारीआने वाले समय में शोधकर्ता जहर के अणु की अलग-अलग मात्रा पर इसकी प्रभाविकता की जांच करेंगे और देखेंगे कि क्या यह वायरस को पहले चरण में कोशिका के भीतर प्रवेश करने से रोकने में सक्षम है या नहीं। साओ पाउलो की स्टेट यूनिवर्सिटी ने इसकी जानकारी दी जो इस रिसर्च में शामिल है। रिसर्चर्स मानव कोशिकाओं में इसकी जांच करने की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि इसे लेकर कोई समयसीमा अभी नहीं बताई गई है।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/3jwh9kJ
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

काबुल अफगानिस्‍तान में शर्मनाक हार और अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद चौतरफा घिरे जो बाइडन ने अपनी शेखी बघारी है। बाइडन ने कहा कि अमेरिका ने देश के इतिहास में सबसे बड़ी जंग को अफगानिस्‍तान में खत्‍म किया है। इस दौरान 1 लाख 20 हजार लोगों को हवाई रास्‍ते से निकाला गया। उन्‍होंने कहा क‍ि किसी भी देश ने कभी भी इतिहास में इतने लोगों को निकालने का काम नहीं किया है। इस दावे के बाद बाइडन सोशल मीडिया में बुरी तरह से ट्रोल होने लगे और लोगों ने उन्‍हें भारत के कुवैत में चलाए गए अभियान की याद दिलाई। बाइडन ने अपने बयान में यह भी कहा कि केवल अमेरिका के अंदर यह क्षमता और इच्‍छाशक्ति है कि वह इतने लोगों को निकाल सकता है। हमने यह कर दिखाया है। बाइडन ने कहा कि 20 साल से चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए अफगानिस्तान से सेना वापस बुलाना अमेरिका के लिए ‘सबसे अच्छा और सही’ फैसला है। बाइडन ने कहा कि ऐसा युद्ध लड़ने की कोई वजह नहीं है जो अमेरिकी लोगों के ‘अहम राष्ट्रीय हितों’ में न हो। उन्होंने कहा, ‘मैं आपको वचन देता हूं कि पूरे दिल से मैं यह मानता हूं कि यह अमेरिका के लिए सही, विवेकपूर्ण और सबसे अच्छा फैसला है।’ 'चीन के साथ गंभीर प्रतिस्पर्धा, रूस के साथ कई मोर्चों पर चुनौतियां' उन्होंने कहा, ‘जब मैं राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहा था तो मैंने अमेरिकी लोगों से वादा किया था कि मैं इस युद्ध को खत्म कर दूंगा और आज मैंने वह वादा पूरा कर दिया। अफगानिस्तान में युद्ध के 20 वर्षों बाद मैंने अमेरिकी बेटों और बेटियों की एक और पीढ़ी को ऐसा युद्ध लड़ने के लिए भेजने से इनकार कर दिया जिसे पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था।’ बाइडन ने कहा कि विश्व बदल रहा है और अमेरिका नयी चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा, ‘हमारी चीन के साथ गंभीर प्रतिस्पर्धा है। हम रूस के साथ कई मोर्चों पर चुनौतियों से निपट रहे हैं। हमने साइबर हमलों और परमाणु प्रसार की चुनौतियों का सामना किया।’ भारत ने रचा था इतिहास, अमेरिकी दावे की खुली पोल अफगानिस्‍तान से सबसे ज्‍यादा लोगों को निकालने के दावे पर जो बाइडन सोशल मीडिया में ट्रोल होने लगे हैं। दरअसल, वर्ष 1990 में कुवैत में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के हमले के बाद भारत ने वहां से 1 लाख 70 हजार लोगों को सुरक्षित निकाला था। तत्‍कालीन विदेश मंत्री और बाद में भारत के 12वें प्रधानमंत्री बने इंद्र कुमार गुजराल ने पूरे सूझबूझ के साथ सद्दाम हुसैन के साथ संपर्क साधा और इंडियन एयरलाइंस के विमानों की मदद से सभी भारतीयों को सुरक्षित निकालकर ले आए थे। इंडियन एयरलाइंस के इतनी बड़ी तादाद में लोगों के निकालने को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रेकॉर्ड में जगह दी गई थी।


from World News in Hindi, दुनिया न्यूज़, International News Headlines in Hindi, दुनिया समाचार, दुनिया खबरें, विश्व समाचार | Navbharat Times https://ift.tt/2WDVWg2
via IFTTT

https://ift.tt/36CAGd7

रियाद सऊदी अरब के नेतृत्‍व में गठबंधन सेना ने यमन की राजधानी सना में हूती विद्रोहियों के एक शिविर को हवाई हमला करके तबाह कर दिया है। सऊदी...