Wednesday, 1 September 2021

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डोडोमा अफ्रीका को अगर दुनिया का सबसे ज्यादा जैवविविधता वाला हिस्सा कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। जहरीले सांपों से लेकर प्रकृति को ही अपना भगवान मानने वाली आदिम जनजातियों तक यहां एक से एक बढ़कर एक हैरान करने वाले नजारे मौजूद हैं। यही नहीं, अफ्रीका घर है दुनिया की का। यह इतनी खतरनाक मक्खी होती है कि इससे ‘मर्डरर’ कहा जाता है। यह है Tsetse जिसे सेतसी और तेतसी भी कहा जाता है। यह इतनी जहरीली होती है कि इंसानों तक के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। ...तो हो जाती है मौत नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बातचीत में पेशे से जियोफिजिसिस्ट रत्नेश पांडे ने बताया है कि इस मक्खी के कारण एक तरीके की नींद की बीमारी होती है जिसे अफ्रीकन स्लीप सिकनेस बीमारी कहते हैं। यह जब किसी को काटती है तो ट्रिपनोसोमा नामक पैरासाइट को शरीर में इंजेक्ट कर देती है। यह इतनी खतरनाक होती है कि अगर इसका समय पर इलाज नहीं किया जाए तो मौत तक हो जाती है। अफ्रीका के ट्रॉपिकल और सब-ट्रॉपिकल इलाकों में सेतसी मक्खी कि कुल 21 प्रजातियां पाई जाती हैं। पीती है इंसानों का खून सेतसी मक्खी आमतौर पर सहारा और कालाहारी रेगिस्तान के बीच मध्य अफ्रीका में पाई जाती है। यह इंसानों और जानवरों का खून पीकर जिंदा रहती है। अफ्रीका के लगभग 37 देशों में सेतसी मक्खी का प्रकोप है। अफ्रीकी स्लीपिंग सिकनेस अफ्रीका कि एक बहुत ही घातक बीमारी मानी जाती है जो नर्वस सिस्टम से जुड़ी होती है और meningoencephalitis के लक्षणों से चिह्नित होती है। इसमें व्यवहार में परिवर्तन जैसे नींद ना आना, जैसे लक्षण दिखते हैं। सेतसी मक्खी अफ्रीका में हर साल अनेक मौतों के लिए जिम्मेदार होती है। अजीबोगरीब लक्षण वाली बीमारी अफ्रीकी स्लीपिंग सिकनेस बीमारी के पहले चरण में, बुखार, सिर दर्द, खुजली और जोड़ों में दर्द होता है। यह सेतसी मक्खी के काटने के एक से तीन हफ्ते के अंदर शुरू होता है। कुछ हफ्ते या महीनों में दूसरा चरण शुरू होता है। इसमें मरीज को भ्रम, खराब समन्वय, शरीर का सुन्न होना और सोने में कठिनाई महसूस होती है। उप-सहारा अफ्रीका के 36 देशों मे में यह बीमारी नियमित रूप से होती है। 2010 में इस बीमारी के कारण लगभग 9,000 व्यक्तियों की मौत हुई जबकि 1990 में इनकी संख्या लगभग 34,000 थी। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में अफ्रीका मे लगभग 30,000 लोग इस बिमारी से संक्रमित हैं। इस बीमारी को अगर शुरुआत में ही पहचान लिए जाए तो इसका इलाज संभव हो पाता है और मरीज की जान बचाई जा सकती है। अगर बीमारी को पहचानने में देरी होती है तो यह मरीज के लिए खतरनाक और जानलेवा साबित होता है। रत्नेश बताते हैं कि सेतसी से बचने के लिए अफ्रीका में फील्ड पर काम करने वाले रिसर्चर्स को स्पेशल सूट काम आता है। खाल में कर सकती है छेद इसका धड़ इतना मजबूत होता है कि वह एक मृग, भैंस और हाथी की खाल को छेद सकती है। सेतसी मक्खी 8 से 15 मिलीमीटर की लंबाई की होती है और इसका रंग लाल-भूरा होता है। इसके पंखों पर नसों में, कुल्हाड़ी का आकार होता है जो इसे दूसरी मक्खियों से अलग बनाता है। शांत अवस्था में यह अपने पंखों को मोड़ती है ताकि एक-दूसरे को पूरी तरह से ओवरलैप कर सके। इसके अलावा, सेतसी के सिर के आगे के भाग पर उभरी हुई सूंड प्रोसोकिस से अलग किया जा सकता है। सेतसी मादा मक्खी अपने पूरे जीवन काल मे सिर्फ एक बार नर से मेटिंग करती है और पूरी तरह विकसित सिर्फ 10 लार्वा को जन्म देती है। इसका जीवन 1 से 2.5 साल का होता है। 10 साल से जारी रिसर्च तंजानिया सरकार और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के एक्सपर्ट रिसर्चर्स पिछले लगभग 10 साल से जांजीबार में सेतसी मक्खी को नष्ट करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। इसके लिए वैज्ञानिकों ने लाखों सेतसी मक्खियों को पकड़कर उनमें से नर और मादाओं को अलग किया है। रेडिएशन की मदद से नर सेतसी मक्खियों में प्रजनन की क्षमता खत्म कर दी जाती है। पूरे अफ्रीका में सेतसी मक्खी पर नियंत्रण पाने के लिए इसी तकनीक पर फोकस किया जा रहा है।


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इस्लामाबाद पाकिस्तान ने भी परमाणु बम परीक्षण किया है- यह बात दुनिया के सामने स्वीकार करने वाले वैज्ञानिक अब्दुल कादिर आज जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। कोरोना वायरस का शिकार बने डॉ. कादिर की तबीयत बिगड़ती चली गई है और ताजा जानकारी के मुताबिक उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है। कादिर को पाकिस्तान के परमाणु बम का जनक कहा जाता है। वेंटिलेटर पर रखा गया परमाणु वैज्ञानिक डॉ. को कुछ दिन पहले ही अस्पताल में भर्ती कराया गया था जब कोरोना के कारण उनकी हालत बिगड़ने लगी थी। उनके प्रवक्ता ने बताया था कि कादिर को कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद 26 अगस्त को KRL अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वहीं, अब खबरें आ रही हैं कि उन्हें वेंटिलेटर पर रखने की जरूरत आ पड़ी है। पद से हटा दिया गया था पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में जनक कहे जाने वाले कादिर खान को परमाणु प्रसार की बात स्वीकार करने के बाद पद से हटा दिया गया था। पाकिस्तान ने पड़ोसी भारत से होड़ करते हुए 1998 में पहले एटम बम का परीक्षण किया था। खान को जब से पद से हटाया गया है तभी से वह भारी सुरक्षा के बीच इस्लामाबाद एक इलाके में अलग-थलग रहते हैं। हालांकि, प्रशासन का कहना है कि उन्हें सुरक्षा कारणों से इस तरह से रखा गया है। कई देशों की मदद की कादिर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया को एटम बम बनाने के लिए मदद दी थी। कादिर ने उन्हें यूरेनियम संवर्धन के लिए सप्लाई डिजाइन, हार्डवेयर और मटीरियल उपलब्ध कराने में मदद की थी। अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसी आईएईए ने कहा था कि कादिर न्यूक्लियर ब्लैक मार्केट का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं और विभिन्न देशों के लोगों की इसमें मदद की है।


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काबुल अफगानिस्तान में तालिबान शासन आने को लेकर दुनिया का सबसे बड़ा डर सच साबित होता दिख रहा है। दुनिया के कई देशों, खासकर भारत के लिए चिंता का सबब रहे आतंकी संगठन अल-कायदा ने तालिबान को अफगानिस्तान फतह के लिए बधाई दी है। यही नहीं, इसी तर्ज पर 'कश्मीर और दुनिया की दूसरी इस्लामिक जमीनों को इस्लाम के दुश्मनों से छुड़ाने के लिए आजादी' हासिल करने को भी कहा है। 'कश्मीर भी आजाद हो' अमेरिकी सेना ने पूरी तरह से अफगानिस्तान छोड़ दिया है और उसके आखिरी सैनिक के जाते ही तालिबान ने अफगानिस्तान की 'पूरी आजादी' का ऐलान किया था। इसके बाद अल-कायदा ने बयान जारी किया है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान को बधाई देने के साथ ही कहा है- 'लेवंट, सोमालिया, यमन, कश्मीर और बाकी सभी इस्लामिक जमीनें इस्लाम के दुश्मनों के शिकंजे से आजाद हो जाएं। दुनियाभर में मुस्लिम कैदियों को आजादी मिले।' अल-कायदा की मौजूदगी चिंता का विषय तालिबान के साथ अमेरिका शांति समझौता इसी शर्त पर करता रहा कि अल-कायदा को अफगानिस्तान की जमीन पर पनपने नहीं दिया जाएगा और देश में उसकी वापसी नहीं होगी। अमेरिका अफगानिस्तान से तालिबान को खत्म करने के इरादे से आया भी अल-कायदा की वजह से ही था। वहीं, भारत के लिए भी यह अहम है कि अफगानिस्तान की जमीन से उसके खिलाफ आतंकी गतिविधियों और हमलों को अंजाम न दिया जाए। 'अमेरिका को भगा दिया' अल-कायदा ने अपने संदेश में कहा है, 'ईश्वर का शुक्रिया जिसने अमेरिका को बेइज्जत किया और हरा दिया..अमेरिका की कमर तोड़ दी, वैश्विक छवि खराब कर दी और भगा दिया..अफगानिस्तान की इस्लामिक धरती से।' आगे कहा है, 'अफगानिस्तान साम्राज्यों का कब्रगाह है और इस्लाम का अभेद्य किला। अमेरिका की हार के साथ अफगानिस्तान ने दो सदियों के अंदर तीसरी बार सफलता से एक बाहरी साम्राज्यवादी ताकतों को बाहर निकाल दिया।' बयान में कहा गया है, 'अमेरिका के शैतान साम्राज्य की हार शोषित दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत है। इस घटनाक्रम से साबित होता है कि जिहाद के रास्ते ही जीत और सशक्तिकरण हो सकता है।'


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काबुल अमेरिका में अफगानिस्तान के नेतृत्व वाले युद्ध का आधिकारिक तौर पर समापन कुछ दीर्घकालिक अनसुलझे सवाल भी छोड़कर गया है, जैसे देश अब एक कार्यशील अर्थव्यवस्था का निर्माण कैसे कर सकता है? अब जबकि अमेरिकी सहायता खत्म हो गई है और अंतरराष्ट्रीय मदद भी काफी हद तक बंद हो गई है तो अफगानिस्तान के पास क्या विकल्प बचे हैं? एक विकल्प प्राकृतिक संसाधनों के तौर पर बचा है। अफगानिस्तान में गैर-ईंधन खनिजों का खजाना है जिनका मूल्य एक हजार अरब अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा आंका गया है। उत्खनन में लगेंगे 10 सालखनिजों की कुल प्रचुरता निश्चित रूप से अकूत है लेकिन इन संसाधनों को अभी खोज जारी है। यहां तक कि उन्हें निकालना कितना फायदेमंद हो सकता है, इस बात की बेहतर समझ के बावजूद इन संसाधनों की मौजूदगी मात्र से नई अर्थव्यवस्था को फौरी उछाल नहीं मिलेगा। उनके संसाधनों का अध्ययन करने वाले एक भूविज्ञानी के तौर पर, वाशिंगटन विश्वविद्यालय के स्कॉट एल मांटगोमरी का आकलन है कि खनन को राजस्व के मुख्य स्रोत पर तैयार करने के लिये बड़े पैमाने पर उनका उत्खनन करना होगा और इसके लिये कम से कम सात से 10 वर्ष का समय लगेगा। खनिजों का अपार भंडारब्रिटिश और जर्मन भूविज्ञानियों ने 19वीं शताब्दी और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में अफगानिस्तान के खनिजों का शुरुआती आधुनिक सर्वेक्षण किया था। सोवियत संघ ने हालांकि 1960 और 1970 के दशक में पूरे देश में सबसे व्यवस्थित जांच की और बड़े पैमाने पर विस्तृत जानकारी जुटाई जो आज के दौर के आधुनिक अध्ययनों की रीढ़ बना है। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण (यूएसजीएस) ने 2004 से 2011 तक उपलब्ध आंकड़ों की विस्तृत समीक्षा की और अपने हवाई सर्वेक्षण, सीमित क्षेत्रीय जांच तथा अफगानिस्तान भूगर्भ सर्वेक्षण के जरिये इसमें नई जानकारी भी जोड़ी। इससे खनिज स्थलों, उनकी उपलब्धता और प्रचुर भंडार के बारे में बेहतर पहचान हुई। इस काम में हालांकि सोवियत दौर के प्रयासों की कोई अनदेखी नहीं कर सकता। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यूएसजीएस ने देश के 24 इलाकों की पहचान की और वहां खनिजों के अपार भंडार का आकलन किया। चीनी और भारतीय कंपनियों ने भी इसमें रुचि दिखाई और उन्हें रियायत भी दी गई। अनुबंध की शर्तों और सुरक्षा चिंताओं के कारण हालांकि 2010 के दशक से यह गतिविधियां थम गईं। अरबों अमेरिकी डॉलर का खजानायूएसजीएस के भूविज्ञानियों का कहना था कि उनके आंकड़े हालांकि अपेक्षाकृत कम अनुमान लेकर चल रहे हैं और वे शुरुआती भी हैं। इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि कुल मिलाकर खनिज अपार हैं। सभी ज्ञात अनुमान के मुताबिक, वहां तांबे का 5.77 करोड़ मीट्रिक टन भंडार हो सकता है जिसकी कीमत मौजूदा हिसाब से 516 अरब अमेरिकी डॉलर होगी। ये संसाधन अभी खोजे नहीं गए हैं- इसकी पहचान जरूर हुई है लेकिन पूरी जांच व आकलन नहीं। अगर आकलन सही है तो तांबे के मामले में अफगानिस्तान दुनिया के पांच शीर्ष देशों में होगा। इसके बाद यहां कोबाल्ट की भी अच्छी मात्रा है। अयनक अयस्क का भंडार काबुल से करीब 30 किलोमीटर दक्षिणपूर्व में स्थित है। उच्च गुणवत्ता वाले अयनक का कुल भंडार तांबे का 1.13 करोड़ मीट्रिक टन माना जा रहा है जिसका मौजूदा बाजार भाव 102 अरब अमेरिकी डॉलर है। अफगानिस्तान में विश्व स्तरीय लौह अयस्क संसाधन भी बामियान प्रांत के हाजी गाक इलाके में हैं। अनुमान के मुताबिक, हाजी गाक में 210 करोड़ मीट्रिक टन उच्च स्तरीय अयस्क होगा जिसमें 61-69 प्रतिशत लोहे का वजन होगा। मौजूदा दर के हिसाब से यह 336.8 अरब अमेरिकी डॉलर का होगा। इससे अफगानिस्तान दुनिया के 10 शीर्ष देशों में आ जाएगा जिनके पास खनन के लिये इतना लौह अयस्क भंडार है। नूरीस्तान प्रांत में लीथियम का खासा भंडार है। हेलमंद प्रांत में धरती से दुर्लभ पत्थर और रत्न, पत्थर आदि भी मिलते हैं। इनका अनुमानित भंडार 14 लाख मीट्रिक टन है। इनमें से दो प्रेजोडायमियम और नियोडिमियम ऊंची कीमत वाले हैं जो करीब 45 हजार अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से बिकते हैं। इनसे शानदार चुंबक का निर्माण होता है जो हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों की मोटर में इस्तेमाल होते हैं। तालिबान सरकार के हाथ अफगानिस्तान का भविष्यखनन ज्ञान यह कहता है कि जमीन के अंदर जो है वह जमीन पर मौजूद चीजों और परिस्थितियों से कम महत्वपूर्ण है। बाजारी हकीकत, सुरक्षा, अनुबंध शर्तें, अवसंरचना और पर्यावरणीय चिंताएं महज संसाधनों की मौजूदगी से ज्यादा अहम होती हैं। इन कारकों में से सबसे महत्वपूर्ण है धातुओं के लिये फिलहाल मजबूत वैश्विक मांग। अफगानिस्तान इन धातुओं का खनन शुरू कर सकता है या नहीं, यह नई तालिबान सरकार पर निर्भर करेगा। पूर्ववर्ती खनन मंत्रालय के तहत अयनक तांबा भंडार के एक हिस्से के लिये 2.9 अरब डॉलर का अनुबंध चीन की दो सरकारी कंपनियों को दिया गया था। अफगानिस्तान के लिए उसके संसाधन दीर्घकालिक विदेशी निवेश, कौशल निर्माण व अवसंरचना विस्तार का जरिया हो सकते हैं जो सतत अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कंपनियां जुड़ेंगी। अफगानिस्तान भूराजनीतिक संघर्षों के केंद्र में भी है जिसमें भारत व पाकिस्तान के अलावा, चीन, ईरान और अमेरिका भी शामिल हैं। देश पर अब तालिबान का नियंत्रण है । यह हालात देश के संसाधनों को बड़े निवेश के लिये आकर्षक तो नहीं बनाते।


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काबुल करीब 20 साल तक जंग लड़ने के बाद अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्‍तान से लौट चुकी हैं। अमेरिका की इस शर्मनाक हार के बाद जिस तस्‍वीर सबसे ज्‍यादा चर्चा हो रही है, वह है अफगानिस्‍तान से लौटे आखिरी अमेरिकी सैनिक क्रिस दोनाहुए। अमेरिकी सेना में मेजर जनरल क्रिस दोनाहुए की प्‍लेन पर चढ़ने की तस्‍वीर को अमेरिका के विरोधी सुपर पावर की पराजय के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि हकीकत इससे उलट है और मेजर जनरल क्रिस अमेरिकी सेना के लिए 'बाहुबली' की तरह से हैं जो अब तक 17 बार विभिन्‍न संकटों से उबार चुके हैं। अपनी राइफल झुकाए मेजर जनरल क्रिस के आखिरी सी-17 प्‍लेन पर चढ़ने की यह तस्‍वीर दुनियाभर में वायरल हो गई है। मेजर जनरल क्रिस 82वें एयरबॉर्न डिव‍िजन के कमांडर हैं। अफगानिस्‍तान से सबसे आखिर में निकलकर वह अब इतिहास का अभिन्‍न हिस्‍सा बन गए हैं। एयरबॉर्न डिविजन के कमांडर के रूप में अपनी भूमिका के बारे में मेजर जनरल क्रिस ने एक मीडिया संगठन से कहा था, 'यह बहुत ही सुखद और नतीजों से भरा और सबसे अच्‍छा जॉब है जिसे मैंने अभी तक किया है। मैंने कई आसान काम किए हैं लेकिन मैं आप से कह सकता हूं कि यह सबसे शानदार काम है।' अब तक 17 बार संकटमोचक की भूमिका निभाई मेजर जनरल क्रिस ने अमेरिका के सैन्‍य अकादमी से स्‍नातक की पढ़ाई की है। उन्‍हें इन्‍फैंट्री ब्रांच में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में वर्ष 1992 में नियुक्‍त किया गया था। मेजर जनरल क्रिस को गत अगस्‍त महीने में अफगानिस्‍तान रवाना किया गया था ताकि काबुल एयरपोर्ट को सुरक्षित तरीके से खाली किया जा सके। वह भी तब जब अफगानिस्‍तान को खाली करने की 31 अगस्‍त की समयसीमा नजदीक आ रही थी। इससे पहले वह पेंटागन में ज्‍वाइंट चीफ्स ऑफ स्‍टॉफ के विशेष सहायक रह चुके थे। अमेरिकी सेना के लिए मेजर जनरल क्रिस हनुमान की तरह से हैं। उन्‍होंने अब तक अफगानिस्‍तान, इराक, सीरिया, उत्‍तरी अफ्रीका और पूर्वी यूरोप में 17 बार संकटमोचक की भूमिका निभाई है। अब उनकी घर वापसी की तस्‍वीर को अमेरिकी हार की प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। पेंटागन की ओर से जारी इस तस्‍वीर को अब तक 14 हजार से ज्‍यादा बार रीट्वीट किया गया है और 64 हजार लोगों ने लाइक किया है। विमान के रवाना होने से पहले साथियों को दिया यह आखिरी संदेश अफगानिस्‍तान से वापसी के समय में मेजर जनरल क्रिस के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। उनकी तस्‍वीर को नाइट विजन डिवाइस की मदद से लिया गया है। अफगानिस्‍तान से लौटते समय उन्‍होंने आखिरी बार तालिबान के कमांडरों से बात की और उन्‍हें बताया कि अमेरिकी सेना आखिरकार जा रही है। उन्‍होंने विमान के रवाना होने से पहले अपने साथियों से आखिरी संदेश कहा, 'बहुत अच्‍छा काम किया। मुझे आप सभी पर गर्व है।'


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वॉशिंगटन इंसान का दिमाग उसकी जिंदगी से जुड़ी हर चीज को याद रखता है। इंसान जो कुछ भी अपने अनुभवों से सीखता है इंसानी दिमाग उसे सुरक्षित कर लेता है लेकिन अब शोधकर्ताओं ने इसको लेकर नई आशंका जताई है। शोधकर्ता सोचते हैं कि इंसानी दिमाग के 'फिल्टर' होने की संभावना है यानी वह सब कुछ भूल जाना जो याद रखने के लिए जरूरी नहीं है। विज्ञान पत्रकार और अमेरिकी नौसेना में काम कर चुके Tristan Greene का मानना है कि बस एक मामूली बदलाव पूरी तरह से मानव सभ्यता के भविष्य को बदल सकता है। बच्चों के दिमाग के हिसाब से बना AIयह दावा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को बच्चों और युवाओं के दिमाग को ध्यान में रखकर बनाया गया है। एआई किसी भी चीज को जल्द सीखने लेकिन स्वतंत्र रूप से बदलाव करने में सक्षम होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि दिमाग के अपने 'कोड' होते हैं इसलिए एआई इंसानी दिमाग से कुछ भी कॉपी नहीं कर सकता। ये कोड तब नोट होते हैं जब दिमाग विकसित हो रहा होता है। मानव जीवन को कर सकता है प्रभावित एमआईटी के वैज्ञानिकों ने कुछ साल पहले बताया था कि दिमाग की basal ganglia समय के साथ खुद सीखती हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि एआई कितना एडवांस है यह इंसानों की तरह सूंघ, देख, स्वाद, महसूस और सुख नहीं सकता। इसके बावजूद अगर इंसान एआई को विकसित होने में इसी तरह मदद करता रहेगा तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव जीवन को तेजी से प्रभावित कर सकता है। इंसानी दिमाग पर कर सकता है कब्जारिसर्च के लेखक के अनुसार अगर हम क्वांटम एआई सिस्टम विकसित करते हैं जो इंसानी दिमाग की और ज्यादा सटीकता के साथ नकल कर सकता है तो यह कार्बनिक पदार्थ से संवेदना विकसित करने की दिशा में तकनीक की खोज के लिए लंबा सफर तय कर सकता है। शोधकर्ता के मुताबिक मजबूत ब्रेन-कंप्यूटर-इंटरफेस एक दिन इंसानी दिमाग की भाषा बोलने में सक्षम हो सकता है। एक ऐसी परिस्थिति जिसमें कंप्यूटर हमारी इंद्रियों पर कब्जा कर सकते हैं और हमारे दिमाग में सीधे इनपुट भेज सकते हैं।


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दोहा/काबुल अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद तालिबान के विदेश मंत्री कहे जाने वाले वरिष्‍ठ नेता शेर मोहम्‍मद स्‍टानिकजई ने खुद कतर में भारतीय दूतावास पहुंचकर भारतीय राजदूत दीपक मित्‍तल से मुलाकात की है। दोनों पक्षों के बीच यह पहली औपचारिक बातचीत है। इससे पहले शेर मोहम्‍मद ने कहा था कि वह भारत और अफगानिस्‍तान के बीच जारी आर्थिक और सांस्‍कृतिक र‍िश्‍तों को बरकरार रखने के पक्षधर हैं। उन्‍होंने भारत और पाकिस्‍तान को सलाह दी थी कि दोनों देश अपने द्विपक्षीय मुद्दे खुद सुलाझाएं.... यह वही शेर मोहम्‍मद स्‍टानिकजई हैं जिन्‍होंने वर्ष 1970 और 80 के दशक में भारतीय सैन्‍य अकादमी से प्रशिक्षण हासिल किया था। उस दौरान आईएमए में उनके दोस्‍त शेर मोहम्‍मद को शेरू के नाम से बुलाते थे। आज शेर मोहम्‍मद तालिबान के उन 7 प्रमुख नेताओं में से हैं जिन्‍होंने दोहा में तालिबान और अमेरिका के बीच बातचीत का जिम्‍मा संभाल रखा है। ऐसा पहली बार है जब शेरू से मुलाकात के बाद भारत ने यह स्‍वीकार किया है कि उसका तालिबान के साथ राजनयिक संबंध है। भारतीय सैन्‍य अकादमी में अधिकारी के रूप में प्रशिक्षण ल‍िया शेर मोहम्‍मद को भारतीय सेना ने वर्ष 1979 से 1982 के बीच में प्रशिक्ष‍ित किया था। शेर मोहम्‍मद ने नौगांव के आर्मी कैडेट कॉलेज में एक जवान के रूप में और बाद में भारतीय सैन्‍य अकादमी देहरादून में एक अधिकारी के रूप में प्रशिक्षण हासिल किया था। शेर मोहम्‍मद तालिबान के उन दुर्लभ नेताओं में से एक हैं जो अंग्रेजी बोल सकते हैं। वह तालिबान के पहले के शासन के दौरान अफगानिस्‍तान के उप विदेश मंत्री रह चुके हैं और दुनिया के कई देशों की यात्रा की है। वर्ष 1996 में शेर मोहम्‍मद ने वॉशिंगटन की यात्रा की थी ताकि अमेरिका के तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन तालिबान की सरकार को मान्‍यता दे दें। हालांकि उनकी यह यात्रा असफल रही और क्लिंटन ने मान्‍यता नहीं दी। शेर मोहम्‍मद चीन की भी यात्रा कर चुके हैं। आईएमए के शेरू के बैच के उसके साथी बताते हैं कि स्‍टानिकजई मजबूत शरीर का था, उसकी लंबाई बहुत ज्‍यादा नहीं थी। इसके अलावा वह कट्टर धार्मिक विचारों वाला भी नहीं था। स्‍टानिकजई की उम्र उस समय 20 साल की थी, जब वह भगत बटैलियन की केरेन कंपनी में 45 जेंटलमैन कैडेट के साथ आईएमए में आया था। 'आईएमए में शेरू को सब पसंद करते थे' रिटायर्ड मेजर जनरल डीए चतुर्वेदी उसके बैचमेट थे। वह कहते हैं, 'उसे सभी लोग पसंद करते थे। वह अकैडमी के दूसरे कैडेट से कुछ ज्‍यादा उम्र का लगता था। उसकी रौबदार मूंछें थीं। उस समय उसके विचार कट्टर नहीं थे। वह एक औसत अफगान कैडेट जैसा ही था जो यहां आकर खुश था।' रिटायर्ड मेजर जनरल चतुर्वेदी को परम विशिष्‍ट सेवा मेडल, अति विशिष्‍ट सेवा मेडल और सेना मेडल मिल चुका है। गंगा में डुबकी लगा चुका है शेर मोहम्‍मद रिटायर्ड कर्नल केसर सिंह शेखावत ने बताया, 'वह एक आम युवा था। मुझे याद है एक बार हम ऋषिकेश में गंगा में नहाने गए थे। उस दिन का एक फोटो है जिसमें शेरू ने आईएमए की स्विमिंग कॉस्‍ट्यूम पहन रखी है। वह बहुत दोस्‍ताना स्‍वभाव का था। हम वीकेंड पर जंगलों और पहाड़ों पर घूमने जाते थे। आईएमए में डेढ़ साल में उसने प्री कमिशन ट्रेनिंग पूरी की। इसके बाद उसने अफगान नेशनल आर्मी लेफ्टिनेंट के तौर पर जॉइन की। इसके कुछ पहले ही सोवियत रूस ने अफगानिस्‍तान पर कब्‍जा किया था। साल 1996 में तालिबान के साथ आया शेरू साल 1996 तक स्‍टानिकजई ने सेना छोड़ दी और तालिबान में शामिल हो गया। साल 1997 में न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स में छपे एक लेख में स्‍टानिकजई को तालिबान सरकार का कार्यकारी विदेश मंत्री बताया गया था। इसमें यह भी कहा गया था कि उसने अंग्रेजी बोलना भारत के कॉलेज से सीखा था। बाद के वर्षों में वह तालिबान का प्रमुख वार्ताकार बन गया था। उसका इंग्लिश बोलने का कौशल और मिलिटरी ट्रेनिंग की वजह से उसे तालिबान में अच्‍छा ओहदा मिला। जब तालिबान ने दोहा में अपना राजनीतिक ऑफिस खोला तो वहां तालिबान के सीनियर नेता वहां आने लगे। साल 2012 से स्‍टानिकजई तालिबान का प्रतिनिधित्‍व करता रहा। भारतीय दूतावास को बंद नहीं करने की दी थी सलाह भारत के राजदूतों को निकालते समय शेरू ने इच्‍छा जताई थी कि मोदी सरकार अपनी राजनयिक उपस्थिति को अफगानिस्‍तान में बनाए रखें। इस आशय का प्रस्‍ताव खुद शेर मोहम्‍मद लेकर आया था। शेर मोहम्‍मद दोहा में मौजूद ताल‍िबानी नेताओं के दल में शामिल था। अब्‍बास ने इस अनौपचारिक प्रस्‍ताव से भारतीय दल को चौका दिया था। हालांकि भारत ने उसकी बात को नहीं माना और भारतीय राजदूत और अन्‍य कर्मचारियों को काबुल से निकाल लिया था। खबरों के मुताबिक अब्‍बास दोहा में मौजूद तालिबानी नेताओं में तीसरे नंबर पर आता था। अब्‍बास ने कहा कि वह तालिबान के कब्‍जे के बाद भारत की काबुल की सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंताओं से वाकिफ है लेकिन उसे दूतावास और कर्मचारियों को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए। तालिबानी नेता अब्‍बास ने खासतौर पर पाकिस्‍तानी आतंकी संगठन लश्‍कर-ए-तैयबा और लश्‍कर-ए-झांगवी के लड़ाकुओं की तैनाती की खबर का जिक्र किया और दावा किया कि काबुल में सभी चेकपोस्‍ट तालिबान के हाथों में है न कि इन संगठनों के पास।


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